कुआर के सिधरी

जब चढ़ेला महीनवा कुआर

खूबे छछनेला मनवा हमार

नीक लागेना बहरा के नोकरी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

चेवरा होखे भा खेतवा बधार

सगरो बहेला पनिया के धार

केतना किसिम के मिलेला मछरी

पोठिया बघवा संगे कोतरा टेंगरी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

एकहन पेट फोड़ी पित्ती निकालेली

रगड़ी रगड़ी भउजी धोके बनावेली

भुअरी बिलाई नुकाइल झांके कगरी

चाटेला मिलित चोइया एको कतरी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

सिलउट प सरसो लोरहा से पिसेली

ललका मारचवा लहसुन के घिसेली

पिसत पिसत दुखे हथवा आ पजरी

झांस लागे लोरवा से भरेला नजरी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

जोड़िके आंच माई फोरन जरावेली

माटी के चूल्हा प कड़ाही चढ़ावेली

महकेला सोन्ह जब पड़ेला पपड़ी

सुंघिए के लइका बजावेले थपड़ी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

भनली के चिउरा भूंजा अरवा भात

गजबे सुआद लागे रोटियो के साथ

फीका बा आगा एकरा लाख नमरी

सोना चानी चाहे होखे कवनो दमड़ी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

बरसेला हथिया के मोटे बदरिया 

खोजेला देहि राति के चदरिया

फुटेला कास कसउजा के भीतरी

लउकेला फूल उजर तनि छितरी

बड़ी इयाद आवे गांवे के सिधरी

(सिधरी – मिश्रित छोटी मछलियां, भनली – धान की आगत प्रजाति, कसउजा – कास का पौधा, हथिया – हस्त नक्षत्र))

©श्रीकांत सौरभ, पूर्वी चंपारण

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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