जबसे चढ़ल बइसखवा ये राजा चुए लागल..!

वर्ष 04 में ताड़ी के बखान पर केंद्रित एक भोजपुरी फ़िल्म का यह गाना काफ़ी हिट हुआ था। लिहाज़ा बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ताड़ी का आज भी उतना ही क्रेज़ है। घूमते हुए कल एक गांव में गया था। उससे सटे ही एक विद्यालय है। जिसे क्वारेंटाइन केंद्र बनाया गया है। 100 से ज्यादा मजदूर उसमें भर्ती हैं।

मुझे देखकर ग्रामीणों ने घेर लिया। अब उनकी बात सुनिए, “सर, स्कूल के बाउंड्री के पाछवा ताड़ी बिकाला। राति खा चोरा-नुकाके मजदूर आ जात बाड़े स। बताईं कवनो के करोना धइले होखे त का होई? पूरा गांव में ना पाट जाई?”

जब मैंने पूछा, “आप लोग विरोध क्यों नहीं करते?” वे बोले, “ई बतिया सही बा का, जे ताड़ी-दारू पियला से कोरोनवा मु जाला?”

लोगों ने यह भी कहा, “हाथ में लगावे वाला (सेनिटाइजर) जवन डिब्बा आवता। ओमे दारूए (अल्कोहल) नु रहेला। जब हाथ के सफाई हो जाता त मुंह के काहे ना होई। करोना मुंहवा आ नकवा से नु धरेला। आ घेंटी प बइठ जाला।”

मैंने उन्हें समझाया कि कोरोना सांस की नलियों से गुजरते हुए फेफड़े में घुसता है। जबकि अल्कोहल गर्दन की आहार नाल से पेट में जाता है। एक बार यह वायरस किसी के भी मुंह या नाक से घुसकर जकड़ लिया। उसका कोई इलाज नहीं। इतना जरूर है यह बीमारी टीवी, प्लेग और हैजे की तरह जानलेवा नहीं है। लेकिन संक्रमण दर ज्यादा है।

इस बीमारी से ग्रसित 80 प्रतिशत लोगों में कोई लक्षण ही नहीं दिखता। बचे 20 में 17 प्रतिशत चिकित्सकीय देखरेख में स्वस्थ हो जाते हैं। हां उम्रदराज लोगों, सुगर, बीपी, हार्ट, कैंसर, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले, किडनी व सांस के रोगियों के लिए बीमारी बेहद खतरनाक है।

दरअसल बैशाख व जेठ (अप्रैल से जुलाई) के महीने में ताड़ी भरपूर मात्रा में निकलने लगती है। और पश्चिमी यूपी व बिहार के देहात में मजदूरों के लिए जश्न मनाने का समय होता है। सूबे में शराबबंदी के बावजूद इसका महत्व कम नहीं हुआ है। सस्ती तो है ही आसानी से हर जगह मिल भी जाती है। गेंहू की फसलें कटने के बाद मजदूर खलिहर हो जाते हैं। इस मौसम में सूरज की सीधी धूप से गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है। ऐसे में मजदूरों को दो तीन बट्टा (ग्लास) मारकर किसी पेड़ की छाह में सुस्ताते देखा जा सकता है।

तभी तो वर्ष के नौ महीने नशा से दूर रहने वाले अधेड़ खदेरन, सुबह-सुबह जब बइसाखा चढ़ाकर घर आते हैं। तो मेहरारू को रोमांटिक मूड में कहते हैं, “झुनुआ के माई सुन$ तारु हो। असो छोटका के बियाह में तोहरा खातिर पियोर सिलिक के साड़ी किन ले आएम!” और वह मुंह बिचकाते कहती हैं, “बुझात सुबेरे सुबेरे नासा चढ़ी गइल बा कपार प। 25 बरिस भइल बिअहला, हमार हिया जुड़ा दिहनीं। अब फ़लाना बाबू बनल बानी।”

इन दिनों आदमी कौन कहे, कौवे तक नशे में झूमते हुए उड़ते हैं। खुमारी में किसी के सिर पर चोंच से ठोकर मारकर ज़ख्मी भी कर देते हैं। ताड़ी ताड़ और खजूर दोनों के पेड़ से निकलती है। ताड़ की ताड़ी ज्यादा मात्रा में निकलती है। लेकिन खजूर जितनी मीठी और गाढ़ी नहीं होती। यह भी कहा जाता है कि सूर्यास्त के समय लबनी टांग दी जाए। और अहले भिनसार में उतारा जाए तो पीने पर गुलाबी नशा छाता है। जिसके सेवन से महीने भर में कोई भी बॉडी-बिल्डर बन जाएगा। जबकि धूप लगने से उसमें खट्टापन और नशा दोनों ही बढ़ता है।

ताड़ी पीने वाले के पसीने से अजीब तरह की गंध आती है। इसलिए हर कोई नहीं पीता। लेकिन कुछ शौक़ीन बताते हैं कि ताड़ी के ताज़े रस में कोई गंध नहीं होती। लबनी की सफ़ाई सही तरह नहीं करने से बदबू मारने लगती है। दक्षिण भारत ताड़ी से शक्कर गुड़ भी बनता है। यह औषधीय काम में आता है। और महंगा होता है। अमिताभ बच्चन वाली पुरानी फ़िल्म ‘सौदागर’ तो पूरी तरह से इसी थीम पर आधारित है। किसी समय राजधानी पटना के चुनिंदे रेस्टोरेंटस में फ्रीज में रखकर ताड़ी बिकती थी। जो फ़िल्ट्राइज़ कर बोतल में गुलाब जल डालकर रखी रहती थी। हालांकि इन दिनों पासियों (ताड़ी छेने वाले) की कमी के चलते इसकी पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो पाती।

ज़्यादा मुनाफ़े के लिए विक्रेता उसमें ‘देशी, छोवा, चुअउआ’ की मिलावट धड़ल्ले से कर रहे हैं। इसमें तेज नशा होता है। लेकिन यह किसी की भी सेहत के लिए जबर्दस्त नुकसानदायक है। बावजूद इसके मजदूरों को इससे क्या फ़र्क पड़ता है। वे तो कहते नहीं अघाते कि दिन भर इतनी मेहनत से पसीने बहाते हैं। रात में पीकर सोने से थकान दूर होती ही है। नींद भी ख़ूब आती है। यानी स्वास्थ्य की परवाह किसे है। उन्हें तो बस मादकता चाहिए होती है।

©️®️श्रीकांत सौरभ

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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