नियोजित शिक्षकों की कहानी – ‘हड़ताल’

“मित्रो, इस कुम्भकर्णी सरकार की ईट से ईट बजा देंगे हम लोग। वेतनमान भीख नहीं, हमारा अधिकार है। और हम इसे लेकर रहेंगे!”, यह कहते हुए जैसे ही टीईटी शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष नेता रामायण ठाकुर ने शिक्षक एकता के नारे लगाए। वहां पर उपस्थित शिक्षकों की तालियों की गड़गड़ाहट तेज हो गई।

उनका जोश दुगुना हो चला था। उन्होंने कहा, “अब मैं सम्मानित विद्वान शिक्षक दयाशंकर जी को संबोधित करने के लिए आमंत्रित करना चाहूंगा। भाई इकोनॉमिक्स में पीजी हैं। नेट भी निकाल लिए हैं। और शिक्षा जगत की लेटेस्ट जानकारी इनके पास पूरे डाटा के साथ रहती है।”

वेतनमान को लेकर बिहार में शिक्षकों की हड़ताल की तैयारी चल रही थी। महज़ कुछ ही दिन रह गए थे। करीब डेढ़ दर्जन संगठन एक साथ आ गए थे। वहीं कुछ संगठन अलग तिथि से हड़ताल करने के मूड में थे। लेकिन सबकी बस यहीं मांग थी, ‘उन्हें वेतन वृद्धि नहीं राज्यकर्मी का दर्जा दिया जाए।‘ इसके बावजूद गुटबंदी जारी थी। यहीं कारण था कि टीईटी शिक्षकों का समूह अलग बैठक कर चर्चा कर रहे थे। प्रतापपुर प्रखंड मुख्यालय स्थित बीआरसी में भी इसी की मंत्रणा चल रही थी।

संबोधन सुनकर दयाशंकर मास्साब खड़े हो गए। सजने-संवरने के शौकीन आदमी ठहरे, अविवाहित थे शायद इसलिए। करीने से संवारी गई लट वाली जुल्फ़ी में हमेशा क्योकार्पिन तेल चुपड़ी रहती। मालूम होता था कि तेल चुकर चेहरे पर लुढ़क जाएगा। कुर्ता-पजामा के उपर चढ़ी बंडी में उनका दुबला-पतला शरीर, मानो देश में पसरे कुपोषण का अर्थशास्त्र सीखा रहा था। जबर्दस्त पढ़ाकू थे अखबार का। इतना कि एक बार जब खोलते। पहले पन्ने पर अखबार के नाम के साथ राष्ट्रीय, प्रादेशिक, स्थानीय, संपादकीय, खेल, अंतर्राष्ट्रीय खबरों तक पहुंच जाते। और अंतिम पन्ने में नीचे छपे प्रेस और संपादक का नाम पढ़कर ही ख़त्म करते। सोशल साइट यूनिवर्सिटी के सस्ते ज्ञान से उन्हें आपत्ति रहती थी।

वहां से थोड़ी दूर एक कोने में जाकर मुंह में खाए पान को उन्होंने पीक के साथ थूक दिया। और लौटकर चिरपरिचित शैली में पूछा, “क्या आप बता सकते हैं? पूरे भारत में सबसे कम सैलरी कहां के टीईटी शिक्षकों को मिलती है?

“जी, बिहार में।”, सुरेश दास ने कहा।

“बिल्कुल सही कहा आपने। लेकिन ऐसा क्यों है, कोई बताएगा?” जब उन्हें कहीं से जवाब मिलता नहीं दिखा। तो बोले, “दरअसल पूरे देश में बिहार एकमात्र राज्य है जो अपनी जीडीपी का साढ़े पांच प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। लेकिन यह खर्च शिक्षकों के वेतन नहीं ट्रेनिंग और अन्य मदों में होता है।”

“आरटीई यानी शिक्षा अधिकार अधिनियम लगभग पूरी दुनिया में लागू है। हमारे यहां अक्सर आरटीई का हवाला देकर शिक्षकों के कर्तव्यबोध बताते हुए हड़काया जाता है। लेकिन उसी आरटीई में यह भी नियम है कि गैर टीईटी पास, अप्रशिक्षित या बिना वेतनमान के शिक्षक नहीं रखना है।”, यह शिक्षक अशीषनाथ का स्वर था।

इस पर सुरेश दास ने समर्थन करते हुए कहा, “लेकिन हमारे बिहार में होता इसके उलटा है। वर्ष 15 में हड़ताल के बाद सरकार ने चाइनीज सेवा शर्त बनाकर आधा-अधूरा वेतनमान दिया। जिसका खामियाज़ा हम आज तक भुगत रहे हैं।”

“वहीं तो मैं बता रहा था। इस साजिश की शुरुआत वर्ष तीन और पांच में ही ‘कागज दिखाओ नौकरी पाओ’ वाली नियोजन नीति के साथ की थी। हमारे सीएम साहब की मंशा साफ थी कि 15 सौ रुपए मासिक के मेहनताना पर शायद ही योग्य आदमी शिक्षक बनना चाहे। मजबूरी में कुछ योग्य शिक्षक आ भी गए तो विरोध नहीं जता सकेंगे। अयोग्य की संख्या ज्यादा रहेगी इसलिए।” अशीषनाथ ने कहा।

बीच में ही रहमान अली ने कहा, “सरकार अपने मंसूबे में कामयाब भी रही। एक समय था इन शिक्षकों को नियमित वाले छूत के समान समझते थे। नियोजितों ने कई बार हड़ताल, आंदोलन किया। लेकिन हर बार सरकार ने उनकी आवाज़ दबा दी। कुछ अपनी करनी रही। और कुछ ग्रामीणों में ऐसी धारणा भी बना दी गई। फर्जी कागज़ पर बहाल हैं। अयोग्य हैं। पढ़ाते नहीं। ये इतने के ही लायक हैं। पढ़ाना है नहीं, वेतन चाहिए पूरा। आदि आदि।”

“और उसी का नतीज़ा हम भी आज भुगत रहे हैं। यदि सरकार ने बिना एंट्रेंस या उचित कागज़ जांच कराए नियोजन किया। इसमें हमारी क्या गलती है? यह कहां का वसूल है कि कुछ लोगों के चलते सभी को वाज़िब हक़ से वंचित रखा जाए। आज लाखों पढ़े-लिखे युवक सड़क पर हैं। उनको उचित वेतनमान देकर बहाली करनी की महती जिम्मेवारी भी सरकार की ही है।”, अबकी राबिया ने सवाल उठाया।

सुरेश दास बोले, “इसमें हमारी गलती नहीं, सरकार की चाल रही है। 70 प्रतिशत ग्रामीण बच्चे आज भी सरकारी स्कूलों में ही ककहरा का ‘क’ या अल्फाबेट का ‘ए’ सीखते हैं। सरकार ने शुरू से ही कम वेतन में शिक्षकों को रखा। और वोट बैंक के लिए अन्य लुभावने योजनाओं में पैसे लुटाए गए। मक़सद अभिभावकों को खुश रखना था। वैसे भी योग्य शिक्षक तमाम तरह की तरह गैर शैक्षणिक योजनाओं एमडीएम, बीएलओ, जनगणना, सर्वे में नहीं उलझाए जाएं। कम सैलरी देकर उन्हें हीनता से ग्रसित नहीं बनाया जाए। और वे स्कूल में ईमानदारी से पढ़ाने लगे। तो पढ़-लिखकर गरीब के बच्चे अधिकार नहीं मांगने लगेंगे।”

“लेकिन ये तो लोकतांत्रिक मूल्यों का सरासर हनन है। हमारे संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना की गई है, शोषणकारी नहीं। जहां राज्य सरकार कितना भी निजी क्षेत्र को बढ़ावा दें। सरकारी संस्थानों और कर्मियों को हर हाल में प्राथमिकता देनी है। इसमें शिक्षा का स्थान सबसे उपर है।”, ये बात चंदन झा ने कही।

उन्होंने वहां बैठे अन्य लोगों की ओर एक नजर डाली। लगा कि सभी उनको चाव से सुन रहे हैं। बोले, “भले ही सरकार ने मुख्य मुद्दे से भटकाकर आम जनता के बीच हमारी छवि धूमिल की है। लेकिन कहना चाहूंगा आप सबसे। पड़ोस, गांव का लोग मज़ाक उड़ाते हैं न हमारा। कल उनके भी बच्चे जब हाथों में कई तरह की डिग्रियां लिए धक्के खाएंगे तो आटा-चावल का भाव समझ में आ जाएगा।”

दयाशंकर की मुख मुद्रा अब गंभीर दिखने लगी थी। उन्होंने हाथों से इशारा किया तो सभी चुप हो गए। बोले, “सरकार ने यह क्रम वर्ष 10 तक जारी रखा। और लाखों शिक्षकों की बहाली कर ली। उस बाद हम टीईटी शिक्षकों की बारी आई। सरकार की मिलीभगत से एक तो मीडिया ने पहले ही शिक्षकों की छवि खराब कर डाली थी। उस पर नेतागिरी के फेरे में सुप्रीम कोर्ट में भी हम अपना पक्ष सही तरह से नहीं रख पाए।”

“लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पैराग्राफ 78 में तो स्पष्ट निदेश दिया है टीईटी शिक्षकों के लिए?”, अशीषनाथ ने कहा।

“आशीष सर, ध्यान दीजिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है निर्देश नहीं। राज्य सरकार चाहे तो हम टीईटी शिक्षकों को वेतनमान देने पर विचार कर सकती है। लेकिन सरकार यह सुझाव मानने से रही। उसे शैक्षणिक गुणवत्ता या योग्य शिक्षकों से क्या मतलब बनता है? यहां तो वोट बैंक की राजनीति है। और संख्या में हम एक तिहाई हैं। हम लोगों को राज्यकर्मी का दर्जा देने से जितना फायदा होगा। उससे ज्यादा सरकार को वोट का नुकसान।”

“इसका मतलब हुआ सभी को एक साथ हड़ताल पर रहने में ही भलाई है? लेकिन कुछ टीईटी और माध्यमिक शिक्षक संघ बाद के दिनों में हड़ताल पर जाने के पक्ष में क्यों हैं?”, राबिया ने पूछा।

इसके जवाब में संघ के जिलाध्यक्ष रामायण ठाकुर ने कहा, “यदि सरकार हमारे संवैधानिक हकों को नहीं देती। तो उसी संविधान में हमे विरोध जताने का अधिकार भी दिया है। ‘संघे शक्ति कलियुगे सुने हैं न?’ समय के मुताबिक उचित निर्णय तो यहीं रहेगा। हम सभी मिलकर एकता दिखाएं। और एक साथ हड़ताल पर चलें। वैसे जिनको इसी बहाने राजनीति चमकानी है। उनकी बात और है।”

“वो तो ठीक है। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है वर्ष 15 की तरह इस बार फिर हमारे साथ धोखा नहीं हो?”, सुरेश दास ने असमंजस में सवाल उठाया।

तो उन्होंने कहा, “इस बार बजाप्ते सभी मुख्य संघों की लिखित समन्वय समिति बनी है। ऐसे में कोई नकारात्मक राजनीति कर बदनाम नहीं होना चाहेगा। सोशल साइट्स, व्हाट्सएप्प ने हम सबको बेहद सशक्त बनाया है। हर पल की सूचना मिल जाती है। इसलिए एक या दो नेता के चलते हड़ताल का टूटना नामुमकिन है।”

उनके इतना कहते ही उपस्थित शिक्षकों ने एक स्वर में हामी भरी। एक बार फिर से अभियान गीत गाया सबने। सादे कागज पर प्रस्ताव पास कर घोषणा हुई। और अगले सप्ताह के पहले दिन से ही हड़ताल पर जाने के निर्णय के साथ बैठक समाप्त कर दी गई।

©️®️श्रीकांत सौरभ (नोट – इस कहानी के पात्र पूरी तरह से काल्पनिक हैं। इसमें प्रयुक्त किसी जगह या प्रसंग की समानता संयोग मात्र कही जाएगी। इसके लिखने का एक मात्र उधेश्य मनोरंजन है।)

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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