‘नीचे इश्क है उपर रब है, इन दोनों के बीच में सब है’

मित्रो, अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक साल का पहला दिन था। आज पांच बजे ही नींद टूट गई। आदत के मुताबिक मोबाइल लेकर टीपने लगा। सोचा, दो घण्टे पहले जगा हूं। क्यों नहीं, कोई फिल्म देख ली जाए। नेटफ्लिक्स खोला। बॉलीवुड की पुरानी मूवी खंगलाते हुए ‘ताल’ पर नजर ठहर गई। सहसा फ्लैश बैक में चला गया। वर्ष 1999 का वह अगस्त महीना। जब मोतिहारी के ‘संगीत टॉकीज’ में फिल्म लगी थी।

तब आईएससी प्रथम वर्ष का छात्र था। अखबार में फिल्म का जबर्दस्त विज्ञापन आ रहा था। समीक्षा भी आई थी। एक तो कम्प्लीट शो मैन सुभाष घई की ड्रीम फिल्म। वहीं ए आर रहमान की फ्यूजन म्यूजिक। यानी लाइट क्लासिकल गाने के साथ प्राकृतिक वाद्य यंत्र घड़ा, चम्मच, थाली की आवाज का प्रयोग। उस पर विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय जैसी नवोदित अभिनेत्री का इनोसेन्ट अभिनय। और चर्चा यह कि आधी फिल्म में बिना मेक अप ऐश्वर्या की लुक आउट गजब की दिखती है।

पहले दिन ही शो देखने की लालच नहीं रोक पाया। पूरे 20 रुपए ब्लैक में टिकट खरीदा था मैंने। फिल्म मानव व मानसी के प्यार पर केंद्रित था। मानव मेहता (अक्षय खन्ना) एक बड़े उद्योगपति जगमोहन मेहता (अमरीश पूरी) का लड़का। स्कॉटलैंड से पढ़कर लौटा था। विदेशों में पढ़े होने बावजूद जड़ों से जुड़ा हुआ सांस्कारिक युवक। बड़े घराने के होने का लेस मात्र घमंड नहीं।

उसकी फैमिली आउटिंग कम बिज़नेस ट्रिप के मकसद से हिमाचल के चंबा में आई है। मानव विदेश से सीधे वहां घूमने आता है। जहां स्थानीय लोकप्रिय फोक गायक व संगीतकार तारा बाबू (आलोकनाथ) की इकलौती बेटी मानसी (ऐश्वर्या राय) के प्रेम में पड़ जाता है। फिल्म देखते हुए, पता नहीं क्यों। वह किशोर उम्र का आकर्षण था या कुछ और।

सादगी भरा वो निश्चल चेहरा, सुरमई आंखे, हंसते हुए गालों पर पड़ा डिम्पल। नृत्य करते हुए सुडौल फिगर की लचक। उस वक्त कमसीन चेहरा वाली ऐश्वर्या बलां की खूबसूरत लगी थीं। जादुई परी सी। इतनी कि उससे पहले मैं पटकथा या हीरो के चलते फिल्में देखता था। लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद विश्व सुंदरी का लाइफ टाइम फैन बन गया।

खैर, मुद्दे पर लौटता हूं। 20 साल बाद मैंने फिल्म को दुबारा नए सिर से देखा। भले ही मैं इन वर्षों में 15 से 35 का हो गया। लेकिन कुछ भी तो बदला सा नहीं लगा फिल्म में। वहीं चंबा घाटी का मनमोहक पहाड़ी दृश्य, नदी, झरना। बैकग्राउंड में गूंजती रहमान साहब की शास्त्रीय तान। और तारा बाबू का संगीताश्रम। जहां मानव को मानसी मिली। मानसी बोले तो मनोहरी छवि वाली एक सुंदरी। कुशल नृत्यांगना, गायक व योगा शिक्षक भी। उसका बेहद सादगी से मानव को योगा सिखाना। एक-दूसरे के प्रेम में पड़कर फिर से मिलने का वादा कर मानव का मुम्बई लौटना।

कुछ दिनों बाद उससे मिलने के लिए पिता के साथ मानसी का भी मुम्बई पहुंचना। लेकिन वहां पहुंचने पर उनके साथ बुरा व्यवहार होना। मानव की अनुपस्थिति में उसके भव्य कोठीनुमा घर पर उसके भैया, भाभी, चाचा, चाची व पिता का तारा बाबू की गरीबी का मजाक उड़ाना। अमीरी के दंभ में सरस्वती के साधकों को नीचा दिखाना। बेइज्जती से निराश दोनों कलाकार पिता-पुत्री।

उनकी जिंदगी में स्टार म्यूजिक डाइरेक्टर विक्रांत मल्होत्रा (अनिल कपूर) का यू टर्न बनकर पाना। मानसी के अंदर छुपी हुई कला को पहचान कर उसे प्रोमोट कर अंतराष्ट्रीय स्तर की कलाकार बनाना। इसी दौरान एमटीवी के अवार्ड शो में मानसी का मुख्य अतिथि के तौर पर आना। उसमें बिन बुलाए मानव का भी प्रवेश करना। और मिलने के बहाने मानसी के पास जाकर बुदबुदाना, ‘इस झूठी दुनिया पर भरोसा मत करना यार।’ माया नगरी की हकीकत बयां कर देती है।

सबसे खास रहा, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ‘मानव’ का हार नहीं मानना। कठिन जद्दोजहद के बाद दोनों का नाटकीय ढंग से मिलन। फिल्म में नृत्य, संगीत, अभिनय, प्यार, घृणा, प्राकृतिक सुंदरता, भावुकता, स्वाभिमान, अभिमान, व्यवहारिकता, ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध। क्लाइमेक्स बेहतरीन है। अंत के साथ सीख भी देती है।

आदमी की कीमत उसकी प्रतिभा होती है। ना कि पास का बेशुमार धन। किसी को कमजोर आंककर, उसकी भावनाओं से ना तो खेलना, ना ही उसे नीचा दिखाना चाहिए। जीवन में तरक्की के लिए व्यवहारिक बनना जरूरी शर्त है। सबसे कठिन काम है किसी का दिल जीतना। चाहे किसी की भी पारिवारिक पृष्ठभूमि कैसी भी हो, प्रेम के मामले एक पिता को अपनी संतान के आगे झुकना ही पड़ता हैं। और फिल्म देखने के बाद कोई सब कुछ भूल क्यों नहीं भूल जाए। ये वाला गाना जरूर सभी के जेहन में छाप छोड़ देता है।

नीचे इश्क है ऊपर रब है,
इन दोनों के बीच में सब है,
एक नहीं सौ बातें कर लो,
सौ बातों का एक मतलब है,
रब सब से सोना इश्क इश्क,
रब से भी सोना इश्क,

इश्क बिना क्या जीना यारों,
इश्क बिना क्या मरना यारों,
गुड़ से मीठा इश्क-इश्क,
इमली से खट्टा इश्क इश्क,
हीरा ना पन्ना इश्क-इश्क,
बस एक तमन्ना इश्क-इश्क,

©️®️श्रीकांत सौरभ (Disclaimer : मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूं भाई। फिल्म देखते हुए जो मन मे आया लिख दिया। कुछ गलत लगे तो क्षमा कर देना।)

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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