पेट रुपया, डॉलर, यूरो से नहीं, अनाज से ही भरता है

पत्नी – ‘ए जी सुन$ तानी कि ना?’

‘कह$ ना, का कहत बाड़ू?’ पत्नी की आवाज सुन पति ने रिमोट से टीवी का वॉल्यूम कम करते हुए कहा।

पत्नी – ‘चइत बीतत बा। एक-दू दिन में बइसाख चढ़ जाई। मने सउसे कटनी बाकिए बा।’

पति – ‘त ई लॉक डाउन में का कइल जाव? कोरोना बेमारी जे ना करावे। खेतन में गहु पाकके झुरा गइल बा। पछुआ हवा प झनझन बाजत बा। जजात के झरल देखिके करेजा फाटे लाग$ता।

पत्नी – ‘का जाने ए साल भगवान के का मंजूर बा। ओने केतना हाली आन्ही-पानी, बुनौरी आके तबाही कइलस। अब जवन बाचलो बा ऊ पाता ना घरे आई कि ना।’

पति – ‘उहे नु। जवन चंवरा में रहे ओकरा के त कटवा लिहनी। मने सड़किया के साइड वाला खेतवा में बनिहार जाए में डेरात बाड़े स। काल्हे त मटरू चाचा के खेत में कटनी के बाद दउरी होत रहे। तब ले पुलिस आके डंडा चला देलन स। सुने में आइले थरेसर आला से रुपयो अइठले स।’

पत्नी – ‘सरकार के कहनाम बा गरीबन के तीन महीना ले राशन दिहल जाई। मने किसान जदि खेती कइल छोड़ देवे, ओकरा बाद का होई?’

पति – ‘होई का, फसल समे प कटाई ना त। अनाज कइसे घरे आई। उहे फसल बेंचके रबी के खेती होला। एक बेर जवन सिस्टम बिगड़ी तवन बिगड़ते चली जाई। हमनिए के अनाजवा से गांव-नगर सभे जियता। अदमी रूपया खाके जियता नानु रह सकेला। पेट त अनाज के दाने से भरेला।’

पति-पत्नी के इन चंद संवाद से ही बिहार-यूपी के ग्रामीण इलाके की पूरी तस्वीर उजागर हो जाती है। किसानों के लिए खेतों में खड़ी फसल का मूल्य क्या होता है? इसे कोई कृषक परिवार का आदमी ही अच्छी तरह से समझ सकता है। आम तौर पर उत्तर भारत मे अप्रैल का महीना कटाई का होता है। खेतों में उपजी गेहूं, दलहन फसल की धुंआधार कटाई होती है। कटाई के बाद दउरी की जाती है। खेतों की जुताई होती है। धान के बिचड़े गिराए जाते हैं।

लेकिन इस बार परिस्थिति कुछ अलग है। एक तो फसल के तैयार होने से पहले से ही बेमौसम बरसात ने अधिकांश खेतों को चौपट कर दिया। उस पर कोरोना महामारी के कारण लॉक डाउन में सबका हाल बेहाल है। किसानों का दर्द साधारण तरीके से समझा जाए। लगभग सभी किसान खाने भर अनाज घर में रखकर बचा सौदा बनिया के हाथों बेंच देते हैं। रबी फसल की बिक्री से ही खरीफ की बुआई का खर्च निकलता है। पहले से ली गई खाद-बीज की उधारी, महाजन या बैंक के केसीसी का ब्याज भी सधाने होते है।

किसी कारण से एक बार यदि यह चक्र टूटता है तो इसकी भरपाई शायद ही कोई कर पाए। और इसका दुष्परिणाम भी बेहद भयावह होगा। फसल क्षति अनुदान या फसल बीमा की हकीकत किसी से छुपी नहीं है। उस पर से महंगाई ने ऐसे ही सबकी कमर तोड़ रखी है। प्रभावितों में सब्जी उगाने वाले किसान भी हैं। यह नकदी व्यवसाय है। हाल के दिनों में यह सबसे मुनाफेदार साबित हुआ है। जाने कितने किसानों ने सब्जी की खेती से अपनी तकदीर बदली है। घर बनवाने, बेटे-बेटियों की शादी करने या जमीन लिखाने का काम तक किए हैं। फिर भी मान लें कि बिना सब्जी खाए आदमी कुछ दिन रह भी सकता है। लेकिन बिना अनाज के सेवन के कोई कितना दिन रह पाएगा।

जरा कल्पना कीजिए। गांव-बाजार के किराना दुकानों से लेकर शहर के मॉल तक में जो चावल या आटे के पैकेट बिकते हैं। जब किसी भी कीमत पर उपलब्ध नहीं होंगे। तब लोगों की क्या स्थिति होगी? ऐसे भी सरकारी उदासीनता और बीज-उर्वरक की महंगाई से ग्रामीणों का खेती से मोह भंग हो रहा है। नई पीढ़ी के लिए तो खेती से नाता, बस फसलों के बीच खड़े होने। और सेल्फी या फोटो खींचकर सोशल साइट्स पर पोस्ट करने भर से है। इसके बावजूद किसानों के पास ‘मरता क्या न करता’ वाली स्थिति है। वे नकदी फसल जैसे गन्ना, सब्जी, मक्के, नकदी, लहसुन की खेती पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। और धान, गेहूं की खेती बस जरूरत भर हो रही है। आप ही बताइए यदि किसान खुद की जरूरत भर ही खाद्द फसलों को उपजाएं। किसी भी कीमत पर इनकी बिक्री नहीं करें तो खाद्दान्न कहां से आएगा?

हालांकि मैं ये सब लिखकर किसी को डरा नहीं रहा। हो सकता है कुछ लोगों को ऐसा होना मुमकिन नहीं लगे। लेकिन आंखों देखी सच्चाई को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। चलते-चलते फिर वहीं बात कहना चाहूंगा। आप जरूर मुलाहिजा फरमाइएगा। सूर्य की तपिश में पसीने बहाकर चमड़ी झुलसाने वाले इन्हीं अन्नदाताओं की बदौलत बाजार से लेकर महानगरों तक की चकाचौध कायम है। यह भी कि हमारा पेट रुपया, डॉलर, यूरो से नहीं, अनाज से ही भरता है।

©️®️श्रीकांत सौरभ

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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