“मम्मी उठ$ना स्टेशन आ गइल अपना घरे चलल जाव”

“ननकी ये ननकी, आंखि काहे नइखी खोलत रे बबुआ!”, लालमती देवी ने बच्चे को दो-तीन बार झकझोरा। कोई सुगबुगाहट नहीं देख पति से बोली, “ये जी सुन$ तानी। ननकी के देखीं ना का भइल बा?”

उपर वाले बर्थ पर लेटे पति ने भन्नाते हुए कहा, “ओह! बुझाता तु हमरा के सुते ना देबू। जब नींद लाग$ता बोलके जगा देत बाड़ू।” और फिर से वह झपकी लेने लगा।
लॉकडाउन को लेकर प्रवासियों का पलायन चरम पर था। इसी क्रम में मजदूरों को लेकर लुधियाना से चंपारण जा रही स्पेशल ट्रेन पूरी रफ़्तार में थी। रात के 11 बजने वाले थे। एक तो जेठ का महीना होने के कारण भारी उमस थी। उस पर पंखा भी आग उगल रहा था। दूसरे, पेट में 24 घंटे से अन्न का एक भी निवाला नहीं जाने का कारण यात्रियों की नींद आंखों से कोसों दूर थी। ट्रेन के डिब्बे में किसी तरह लोग करवटें बदल कर अपनी मंजिल का इंतजार कर रहे थे।
पत्नी को दुबारा चिल्लाते देख हरिहर हड़बड़ाहट में बर्थ से नीचे उतरा। अंजाने डर से उसका कलेजा जोरों से धड़कने लगा था। उसने भी बेटे के चेहरे को दाहिने-बाएं हिलाया, सोनुआ ये सोनुआ, उठ ना रे बबुओ!’
मां ने गोद में बैठे बच्चे को ममतामयी नजरों से निहारा। उसका खाली पेट भीतर तक धंस चुका था। अर्ध बेहोशी की हालत में अबकी बच्चे ने पपनी झपकाते हुए आंखें खोली। थोड़ी देर तक शून्य में निहारता रहा, फिर मूंद ली। लालमती ने झोले से पानी की बोतल निकाली जो कि गर्म हो चली थी। बोतल का कॉक खोला और अंजुरी में थोड़ा सा पानी लेकर उसके मुंह पर छींटे मारा।
“मां दूध पिया द। बड़ी भूख लागल बा”, उसने अंघियाए हुए रुंधे गले से कहा। मालूम पड़ रहा था, बच्चा सोते से अचानक जागा हो। यह सुनते ही लालमती ने तेजी से ब्लाउज के बटन खोला। और उसे सीने से लगाकर दूध पिलाने लगी। बच्चा धीरे-धीरे मुंह चुभलाने लगा।
“हे छठी माई, का जाने किसमत में का लिखल बा! केहु तरे हमनी के ठीकठाक घरे पहुंचा दिही। असो छठी घाटे चउबिसा कोसी भरेम जा।”, बेटे के शरीर में हलचल देख वह मन ही मन मन्नत मांगने लगी। वैसे सुबह से लेकर रात तक वह भंगहा, मदनपुर के देवी माई, गांव के ब्रह्म बाबा, डिह बाबा, जिन बाबा जैसे कितने देवता-पितरों के नाम पर भखौती भाख चुकी थी। उसे खुद ही याद नहीं रही होगी।
जबकि सूखकर ठठरी पड़ चुकी उसकी छाती से दूध तो कब का निकलना बंद हो चुका था। दो महीना हो भी तो गया था ढंग से खाए हुए। पति का रेहड़ी पर घुमाकर सब्जी बेंचने का काम बिल्कुल ठप था। घर में राशन नाम मात्र के बचे थे। भंडारे और लंगर की कभी-कभार मिलने वाले रोटी व राजमा चने की सब्जियों के सहारे जिंदगी काटनी मुश्किल थी। रूम रेंट को लेकर मालिक ने भी अब दबाव बनाना शुरू कर दिया था।
दूसरों के देखा-देखी वे भी दो महीने से गांव लौटने का प्लान बना रहे थे। लेकिन पति, पत्नी का छह साल की बेटी और तीन साल के बेटे को लेकर लुधियाना से बेतिया आना, वह भी पैदल चलकर। परिणाम सोचकर ही हिम्मत जवाब दे देती थी। इसी बीच मालूम हुआ कि मजदूरों के लौटने के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है। टिकट बुक हुआ, एक सप्ताह बाद का नम्बर मिला। वे सपरिवार चल दिए।
“मां दुधवा आवते नइखे मुंह में..!” यह सुनकर दुविधाओं में घिरी लालमती का ध्यान उसकी ओर गया। उसने देखा, बोलकर बेटा फिर से अचेत हो गया था।
बगल में बैठी बेटी झुनिया ने दूध पिलाई थमाते हुए कहा, “मां गुड्डू के पिला द। हम एहि तरे सह लेम पानी पी पीके!” झुनिया गुड्डू से तीन वर्ष बड़ी थी। अब थोड़ी समझदार हो चली थी। उसे छोटे भाई की तकलीफ़ देखी नहीं जा रही थी। लेकिन कर भी क्या सकती थी बेचारी!
मां को अवचेतन मुद्रा में देख, उसने ख़ुद ही स्नेहवश भाई के मुंह में दूध पिलाई डाल दी। बोली, “ल$ गुड्डू चीनी-पानी ह। एकरे के दूध समझिके पी ल$। घरे चलल जाई नु त दादी भइस के दूध दिहे, छाली वाला।”
दरअसल लालमती दूध की उपलब्धता नहीं होने के चलते चीनी पानी का घोल तैयार करती। और दूध पिलाई में भरकर बेटे को दे देती पीने के लिए। झुनिया भी उसी से अपना काम चला लेती। लेकिन कब तक चलता यह?
आप पढ़ रहे हैं श्रीकांत सौरभ की कहानी – लॉकडाउन
ट्रेन को चले हुए आज दो दिन बीत चुके थे। और सफ़र था कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रास्ते में कहीं-कहीं समाजसेवी युवक ब्रेड या केला आदि थमा देते थे। लेकिन यह तीन जने के लिए नाकाफ़ी था। झुन्ना तो दूध के अलावा कुछ छूता भी नहीं था।
हरिहर ने मोबाइल में समय देखा, रात के एक बजे का समय दिखा रहा। बटन दबाते ही पिक-पिक की आवाज़ के साथ उसका स्विच ऑफ हो गया। चार्ज नहीं होने से बैटरी जवाब दे गई थी। तभी लगातार हॉर्न बजाती ट्रेन की रफ़्तार धीमी होने लगी। गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर आकर रुकी थी। उसने खिड़की से झांककर जगह का अंदाजा लगाना चाहा।
लाउड स्पीकर से बोला जा रहा था, “यात्रीगण कृप्या ध्यान दें। लुधियाना से चलकर चम्पारण को जाने वाली स्पेशल एक्सप्रेस ट्रेन बदले रूट के कारण भोपाल स्टेशन पर पहुंची है। यहां से ट्रेन अब गंतव्य के लिए प्रस्थान कर रही है। असुविधा के लिए हमें बेहद खेद है।” लेकिन उद्घोषक द्वारा बोला गया अंतिम वाक्य, “आपकी यात्रा मंगलमय हो!” जैसे यात्रियों को चिढ़ाते लग रहा था।
इधर, बेटे में कोई हरकत नहीं देख लालमती बेटी से बोली, “बबी रे, तोरे राखीं बान्हे ला गढ़ी माई से एकरा के मंगले रहनी। अब देही में नइखे ई। आई हो दादा… दूध बिनु मु गइल हमार करेजा के टुक्का..!”, यह कहते हुए वह पुक्का फाड़कर रोने लगी और गश खाकर सीट पर निढ़ाल हो गई।
उसके विलाप से पूरी बोगी ग़मगीन हुए जा रही थी। लेकिन बगल से कोई भी यात्री झांकने तक नहीं आया। सामने बैठे दो यात्री भी अपने बर्थ पर दमी साधे लेटे हुए थे। आख़िर कोई ख़ैरियत पूछता भी कैसे। कोरोना का डर था ही, भूखे व गर्मी से भी सबकी स्थिति दयनीय हो चली थी।
वहीं हरा सिग्नल मिलते ही हॉर्न देकर ट्रेन हल्के धक्के के साथ चल पड़ी। रेंगते हुए कुछ ही देर में उसने तेज रफ़्तार पकड़ ली। इतनी कि सबको पीछे छोड़ते हुए बस भागे जा रही थी, छिटपुट स्टेशनों पर रुकते हुए। भले ही वह हर जगह नहीं रुकती थी। लेकिन परेशानी ये थी कि जहां रुकती वहां पांच-पांच घंटे खड़ी रह जाती। बिल्कुल आशाहीन हो गई थी।
इस तरह दो दिन और चलने के बाद पांचवें दिन सुबह में ट्रेन बेतिया पहुंची। स्टेशन पर उतरे लोगों को जांच कराने के बाद क्वारेंटाइन केंद्रों में पहुंचने की जल्दी थी। जबकि प्लेटफॉर्म पर दो-तीन तीन जगहों से लोगों की चीत्कार उठ रही थी। इस हृदयस्पर्शी दृश्य से उपस्थित रेलकर्मियों और पत्रकारों की आंखें नम हो चली थीं।
मुख्य गेट के पास ही हरहिर, लालमती और झुनिया बच्चे के शव के पास बिलख रहे थे। थोड़ी दूर आगे एक जवान मुस्लिम विधवा का शव रखा था। वह ईद मनाने घर आ रही थी, लेकिन पहले से ही बीमार थी। शायद गर्मी और भूख सहन नहीं कर पाई थी।

इससे बेख़बर उसकी दो छोटी-छोटी अबोध बेटियां, शव पर डाली गई चादरों को हवा में उड़ाकर खेल रही थीं। पिता के साये से पहले ही महरूम हो चुकी इन अभागियों का क्या पता था कि मां अब इस दुनिया में नहीं है। वह किसी किसी तरह यहां तक तो लेकर आ गई थी। लेकिन अब उनके शव को घर लेकर कौन लेकर जाएगा?

तभी छोटी बेटी शव पर लोटाते हुए कहने लगी, “मम्मी उठ$ना मम्मी, हमनी के स्टेशन आ गइल। अब घरे चलल जाव।” यह देख रेलवेकर्मी समेत अन्य यात्रियों की आंखों से आंसू की बूंदें लुढ़क पड़ी। मीडियाकर्मी भी विचलित हो गए। अगले दिन सभी अखबारों में यह ख़बर प्रमुखता से छपी थी, “प्रवासी मजदूरों को लेकर आ रही स्पेशल ट्रेन में भूख से दो मरे”

©️®️श्रीकांत सौरभ (नोट – यह कहानी, पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें ज़िक्र किए गए जगहों और पात्रों के नाम की, किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता संयोग मात्र कही जाएगी।)

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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