लंबी कहानी : छेनीपुर का विनु

भाग -1

राजाराम पहाड़ की घाटियों के बीच बसा एक छोटा सा गांव, छेनीपुर। ‘मधुआ’ विधानसभा में आता है। शहर की सभ्यता से कोसों दूर। जिधर भी नज़र दौड़ाओ। उंचे, लंबे पहाड़, जिन पर कंटीली झार-झंखाड़ से लेकर छोटे-बड़े पेड़ ही पेड़ दिखते हैं। यहां के निवासियों का आम पेशा है, जंगल से शहद निकालकर, फल तोड़कर, मछली पकड़कर नज़दीक के बाजार में पहुंचाना। या फिर केंदू पत्ता चुनकर बीड़ी कंपनी के एजेंट से बेंचना।

आज इस गांव में ‘नेता जी’ आने वाले हैं। विधानसभा चुनाव में कुछ ही दिन तो बाकी रह गया है। इसको लेकर आए दिन नेताद्वय का दौरा लगा ही रहता है। यहां के वार्ड सदस्य खेदन महतो नौंवी कक्षा पास हैं। वार्ड में अपनी हमउम्र के लोगों में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे। थोड़ा-बहुत कानूनी मामलों के जानकार, चतुर और चालाक भी। पंचायती करने में गांव भर में उनकी कोई सानी नहीं।

शायद इसीलिए ग्रामीणों में उनका काफ़ी सम्मान है। केंदू पत्ते के ठेकेदार से साठगांठ कर उन्होंने आर्थिक स्तर भी उंचा कर लिया था। उन्हीं के बथान पर छोटा सा सामियाना टंगा है। बगल में मुर्गों के पंख छीले जा रहे हैं। जिसे देखने के लिए बच्चों की टोली चारों ओर से घेरे हुए थी।

उधर, युवकों व बूढ़ों में इस बात की जम कर चर्चा थी, कि वार्ड सदस्य के यहां मुर्गे का मांस और महुआ मीठा वाले दारू की व्यवस्था है। चुनाव को लेकर उनकी ही बिरादरी के पूर्व विधायक दिनेश्वर महतो जनसम्पर्क करने आ रहे हैं (इलाके में समर्थक उनको ‘नेता जी’ कहकर  संबोधित करते थे)। इस बार भी वे मधुआ विस से किसान मजदूर एकता पार्टी से प्रत्याशी बने हैं। और रूलिंग पार्टी राष्ट्र निर्माण दल के पदासीन विधायक बाबूराम मंडल को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

नेता जी के आने में कुछ ही पल शेष थे। लोगों का हुजूम जुटना शुरू हो गया। महिलाएं भी समूह में पहुंच रही थीं। पार्टी निर्देश के मुताबिक़ उन्हें आगे की कुर्सियों पर बैठाया जा रहा था।  लाउडस्पीकर से देशभक्ति गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों तुम ख़ूब लगा लो…’ 10 बार से ज्यादा बज चुका था। भाषण के लिए मंच सजकर तैयार था। तभी अध्यक्ष प्रभुनाथ ने माइक में बोलना शुरू कर दिया। कृप्या आप लोग स्थान ग्रहण कर लीजिए। कुछ ही देर में प्रत्याशी महोदय हमारे बीच हाज़िर होंगे।

ठीक पांच मिनट के बाद सड़क पर धूल उड़ाती गाड़ियों का काफिला वहां पहुंचा। स्कोर्पियो से उतरते ही दिनेश्वर महतो ने लोगों का अभिवादन हाथ जोड़कर किया। खेदन महतो ने हाथ में पकड़ा हुआ माला उनके गले में डाल दिया। वे नेता जी के कानों में कुछ फुसफुसाते हुए एक तरफ़ ले गए।

“नेता जी, कल रात ‘लाल सलाम’ वाले आए थे। हमेशा की तरह ग्रामीणों से वोट बहिष्कार करने की बात कर रहे थे। ‘छोटका’ घरे आया है। उसने ऐसा समझाया कि आख़िरकार उन सभी को सन्तुष्ट होकर जाना ही पड़ा।”

“कौन छोटका?”, उन्होंने सकपकाकर पूछा।

“अरे हजूर, छोटका नहीं समझे। हमारा बेटा, विनायक। राजधानी में रहकर तेजनारायण यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में एमए कर रहा है। अब तो देश-दुनिया की इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर लेता है। मुझे कुछ समझ में आती हैं, कुछ नहीं।”

“ओहो, क्षमा करें महतो जी। मैं तो भूल ही गया था। याद आया, हम सब उसे प्यार से ‘विनु’ बुलाते थे न! वह देश के इतने बड़े कॉलेज में पढ़ रहा है! आपने बताया भी नहीं?”

“सरकार, मौका कब मिला कि आपको बताता। पिछले चुनाव के बाद दूसरी बार तो आपसे मिल ही रहा हूं।”

“ठीक है, लोग हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। भाषण के बाद उससे मिल लेता हूं।”

मंच के पास नेता जी के पहुंचते ही ‘जिंदाबाद, जिंदाबाद’ के नारे से माहौल गुंजायमान हो उठा।

“अब हमारे माननीय नेता जी सभा को संबोधित करेंगे।”, अध्यक्षीय संबोधन के बाद प्रभुनाथ ने उन्हें माइक थमा दिया। पहले से उपस्थित अन्य पंचायतों के कार्यकर्ता भाषण पूरा कर चुके थे। नेता जी ने औपचारिक संबोधन के बाद क्षेत्र के मुद्दे उछालने शुरू कर दिए।

“आदरणीय भाइयो, बहने, माताए, अभिभावकगण, जल, जंगल, पहाड़ और ज़मीन से हमारा नाता सदियों का है। ये ही हमारे घर, जीविका के आधार हैं, हमारी संस्कृति भी। लेकिन राज्य सरकार पूंजीपतियों के हाथों इसका सौदा कर हमें उजाड़ना चाह रही है। गांव की सड़कों की स्थिति देख ही रहे हैं। बीच घने जंगल में जहां कोई जरूरत नहीं थी। वहां हजारों की संख्या में पेड़ काटकर चौड़ी सड़क बनाई जा रही है। इससे जंगल की शांति भंग हो रही है। शोरगुल से परेशान जंगली जानवर या तो सड़कों पर कुचलकर असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। नहीं तो भागकर बस्ती में आ जा रहे हैं।”

अचानक वृद्ध सुकट महतो बीच में ही खड़े होकर कहने लगे, “कितने जमाने के बाद बिजली का तार आया भी, तो आपूर्ति का कोई निश्चित समय नहीं रहता। ना तो शुद्ध पानी की व्यवस्था हुई है। ना ही बीमारों के इलाज के लिए नज़दीक में कोई अस्पताल बन पाया है।” वे कुछ और कहते कि कार्यकर्ताओं ने उन्हें चुप होकर बैठने का इशारा किया।

वहीं नेता जी ने उन वृद्ध की भावनाओं का ख़्याल रखते हुए उनकी हां में हां मिलाया। फिर लोगों से पूछा, “क्या यहां के सरकारी स्कूल में पढ़ाई होती है?

“नहीं।” एक साथ कई लोगों की आवाज़ आई।

तभी सरपंच गेनालाल खड़े हो गए। बोले, “स्कूल में 200 बच्चों के बीच महज़ एक ही शिक्षक हैं। उनका पूरा दिन एमडीएम का सामान जुटाने, बनवाने और खिलाने में ही बीत जाता है। अन्य दिनों में विभागीय बैठक के नाम पर ‘मास्साब’ ग़ायब ही रहते हैं। आप ही बताइए, रसोइयों के भरोसे क्या ख़ाक पढ़ाई होगी।”

“जी, सरपंच साहब। बिल्कुल मैं भी वहीं कहने वाला था। दरअसल यह सरकार शिक्षा विरोधी है। अबकी बार इसे उखाड़ फेंकना है।” नेता जी बोलते-बोलते पूरे रौ में आ गए थे।

“सर, अभी तक गांव के कई लोगों को वृद्धा पेंशन, इंदिरा आवास, राशन कार्ड नहीं मिला। ब्लॉक कार्यालय से जिला मुख्यालय तक दौड़ लगाते-लगाते थक चुकी हूं।” यह पंचायत की मुखिया महुआ देवी का स्वर था।

“मुखिया जी। मैं आपकी बातों से सौ प्रतिशत सहमत हूं। सिटिंग विधायक जी को लगता है, यह क्षेत्र मेरे कुनबे के लोगों का है। इसीलिए तो पांच वर्षों में इधर विकास के नाम पर ढेला भर नहीं खर्च किए। भाइयो, जो कुछ भी यहां दिख रहा है। वह मेरे कार्यकाल का ही किया धरा है।”

पूरे घण्टे भर बाद नेता जी का भाषण ख़त्म हुआ। उन्होंने लोगों से अपील की, “आग्रह है। कृप्या आप सब भोजन करने के बाद ही यहां से जाएंगे। सारी व्यवस्था है।”

इधर, दालान में खेदन महतो ने बेटे को नेता जी से मिलवाया। विनायक ने पैर छूकर अभिवादन किया। उन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा, “जीते रहो बाबू। तुम ही लोग तो हमारे समाज की शान हो। वैसे कब आए राजधानी से, सब ख़ैरियत हैं न? ख़बर तो देखते ही रहता रहता हूं। बहुत उथल पुथल मची है इन दिनों वहां ।”

“चाचा जी, आप तो जानते ही हैं। यूनिवर्सिटी में शुरू से ही कई विचारधारा काम कर रही हैं। इसी आधार पर अभी दो छात्र संगठन सक्रिय हैं, भारतीय छात्र परिषद और इंक़लाब छात्र एकता। दोनों संगठनों का निर्माण छात्रों के हित की रक्षा के लिए ही किया गया था। दोनों संगठन राष्ट्रवादी मुद्दे को उठाते हैं। लेकिन…।”

तब तक फीकी चाय बनकर आ गई। अध्यक्ष ने पहले ही बता दिया था। नेता जी सुगर का रोगी होने के कारण भोजन नहीं करेंगे। बस एक कप बिना चीनी वाली चाय पियेंगे। जबकि अन्य कार्यकर्ता खाने चले गए।

“बिल्कुल, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन अभी तो इंक़लाब छात्र एकता के ही अध्यक्ष है न। क्या नाम है उनका? हां, याद आया, माधव मुरारी।” नेता जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।

“जी हां, यूनिवर्सिटी में अध्यक्ष पद पर तो अभी माधव ही काबिज़ हैं। मैं भी उसी संघ से जुड़ा हूं। लेकिन केन्द्र में जिसकी भी सत्ता रहे। किसी न किसी संगठन का झुकाव उस ओर रहता ही हैं। पूर्व की सरकार हमारे संघ के समर्थन में थी। और अभी की भारतीय छात्र परिषद के साथ है। बस सारा ‘खेला’ इसी को लेकर है।”, उसने माथे पर बल देते हुए कहा।

“कैसा खेला?”

“सरकार की मंशा है, लोगों को धर्म, राष्ट्रीयता, जात-पात में भ्रमित कर अपनी रोटी सेंकते रहे। पूंजीपतियों की गोद में खेल रही केंद्रीय सत्ता इसी की आड़ में सरकारी तंत्र को बेंचकर निजीकरण लागू कर रही है। उसकी दो तीन नीतियां पहले ही असफल हो चुकी हैं। मीडिया तो पूरी तरह बिका लगता है। वह सरोकारी खबरों को दिखाने के बदले सत्ता की चरण वंदना में लगा है।” विनायक ने चिंतित मुद्रा में कहा।

“लेकिन इस खेल में तो अमीर-गरीब के बीच की खाई और भी बढ़ जाएगी। हर चीज़ का बाज़ारीकरण हो जाएगा। सरकारी नौकरियों में कटौती होगी, निजी कंपनी बढ़ेंगी। और हमारे ही लोग उसमें कम मेहनताना पर श्रम करेंगे। किसान अपनी फसलों को बिचौलियों को कम भाव में बेंचकर, उनसे बने उत्पाद महंगे दामों में खरीदेंगे भी। गेहूं हमारा, आटा उनका। धान हमसे लेंगे, चावल उनका बिकेगा।”, नेता जी ने उसकी बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया।

“एकदम सही कहा आपने। इन्हीं जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ के कारण तो हम सत्ता की नज़रों में खटकते हैं। सत्ताधीश चाहते ही नहीं कि गरीब का कोई लड़का उंची पढ़ाई करे। पढ़ेगा तो, जानकारी नहीं हो जाएगी। फिर तो संगठित होकर अपना हक़ मांगने वालों की तादाद भी बढ़ जाएगी।”

“हां, सच्चाई तो यहीं है। कुछ दिन पहले ही फेसबुक पर ‘द पब्लिक’ वेबसाइट की एक रिपोर्ट का लिंक मिला था। उसमें पढ़ा कि सरकारी शिक्षण संस्थानों को ध्वस्त कर निजी हाथों में देने की तैयारी चल रही है। बड़े-बड़े कारपोरेट घराने स्कूल, कॉलेज खोलेंगे। महंगे दामों में डिग्रियां बेचेंगे। ऐसे में बच्चों को उच्च शिक्षा दे पाना सबके लिए तो मुमकिन नहीं होगा।” इतना कहते हुए नेता जी ने घड़ी की ओर देखा।

“अरे, बातों ही बातों में आधा घण्टा कैसे बीत गया। पता ही नहीं चला। दूसरी ज़गह भी घूमने जाने का कार्यक्रम है। अब चलना चाहिए।” इतना कह उन्होंने फिर से पूछा, “अच्छा तो अभी चुनाव तक रुकोगे न?”

“जी। अभी 20 दिनों तक रुकूंगा। मैं आपकी जीत के लिए अपनी तरफ़ से हरसंभव प्रयास कर रहा हूं। लेकिन वोट के खातिर यह दारू पीने-पिलाने वाली बात मुझे कुछ ठीक नहीं लगा रहा। नशापान से अपना ही तो नुकसान है।”, विनायक की बातों में साफ़-साफ़ नाराज़गी झलक रही थी।

“देखो बेटे, बड़ी ज़गहों पर रहकर तुम भी उन्हीं की ज़बान बोलने लगे हो। यह मत भूलो की मदिरा पीना, शिकार खेलना हमारी परंपरा है। और शहर वाले जो पीते हैं न व्हिस्की, रम, स्कॉच। उतना हानिकारक नहीं होती हमारी ‘देशी’। कितना भी कोई दुबला क्यों नहीं हो। महुआ-मीठा वाली शराब तीन महीने तक पी ले, तो बॉडी बन जाती है।” यह नेता जी का जवाब था।

“खैर, हम चलते हैं। सभी किसी को प्रणाम! जल्द ही फिर मुलाक़ात होगी। आप सब अनुमति दीजिए।”, उन्होंने वहां पर मौजूद लोगों से हाथ जोड़ते हुए कहा।

गाड़ी स्टार्ट हुई। प्रचार गाड़ी में लगे साउंड सिस्टम से ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया’ गाना जोर-जोर से बजने लगा। उनके साथ कार्यकर्ता भी खड़े होकर वहां से निकल लिए। एक बार फिर से वहां उड़ रही धूल का गर्द गुबार चारों तरफ छा गया।

भाग – 2

चुनाव का दिन क़रीब आ रहा था, जंगल, ज़मीन और रोज़गार के मुद्दे भरपूर उछाले जाने लगे। कई तरह के जुमले प्रचारित कर बाहरी-भीतरी की भावनाओं को जगाया गया जा रहा था। नतीजा सत्ता विरोधी वोट एकजुट होते दिखने लगा। विनायक भी टोले-टोले में घूम-घूमकर नुक्कड़ सभाएं करने लगा। ‘टीयू’ की पढ़ाई में छात्र नेताओं से सीखी गई बोलने की कला, अब जाकर काम रही थी। उसका व्यवाहरिक प्रयोग करने का सही मौका मिला था।

वह जहां भी जाता, राजनीति की कठिन बातों को भी सरल ढंग से कहकर लोगों का दिल जीत लेता। सत्ता पक्ष की कमजोरियों, उसकी जन विरोधी नीतियों को छोटे-छोटे उदाहरण देकर, गीत गाकर उज़ागर कर देता। फिर तो तालियों की गड़गड़ाहट और ‘जिंदाबाद’ के नारे से अजीब सी शमां बंध जाती। कम समय में ही वह इलाक़े में काफ़ी लोकप्रिय हो गया। लेकिन इस लोकप्रियता के चलते, विरोधियों से ज़्यादा जलन उसके ही समाज से ‘बागी’ बने युवकों में होने लगी।

“महतो जी घर पर हैं आप, गेट खोलिए।”

मुख्य दरवाजे पर ठकठक की ज़ोरदार आवाज सुन खेदन महतो की नींद टूटी। घड़ी में समय देखा। रात के डेढ़ बजे थे, ‘इस वक्त कौन आएगा यहां?’

उन्होंने खिड़की के छेद से झांककर पहचानने की कोशिश की। बाहर में, सोलर लैम्प की जगमग रोशनी में आंखों को केंद्रित कर देखा। चितकबरे ड्रेस में मुंह को लाल गमछा से ढके 15-20 युवक कांधे पर हथियार टांगे खड़े थे। उनका दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा। किसी तरह खुद को संभाल कर उन्होंने खुद को नॉर्मल किया, और दरवाजा खोला।

“अरे कामरेड आप और अभी? आपका बुलावा आता तो हम ही चले आते। इतनी रात को कष्ट उठाने की क्या जरूरत थी? आइए बैठिए, क्या सेवा करुं आप सबकी।”, उन्होंने समूह के नेतृत्वकर्ता का चेहरा पहचान लिया। वे ‘जनक्रांति’ संगठन वाले थे।

“आपका लड़का विनायक किधर है। उसे बुलाइए जरूरी बात करनी है।” यह कमांडर का स्वर था।

“हां, हां, क्यों नहीं? अभी बुलाता हूं। विनु, ओ बेटा विनु। जरा बरामदे में आना तो।” पापा की आवाज सुन फेसबुक चला रहे विनायक ने मोबाइल में समय देखा।

“इतनी रात को भला पापा क्यों बुला रहे होंगे मुझे?” वह मन ही मन अंदाज़ा लगाते हुए कमरे से निकला। उसकी नज़र बरामदे में मुंह बांधकर बैठे अजनबियों की ओर ठहर गई। उनको पहचानने की असफल कोशिश की।

“आओ इधर बैठो विनु। तुम मुझे नहीं पहचानते होगे, मैं ‘जनक्रांति संगठन’ का कमांडर हूं, हरिमोहन उर्फ़ वारियर। वैसे पिछले दिनों भी हमारे कामरेड आए थे यहां। उनसे तुम्हारी बात हुई थी। तुम इतने बड़े कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हो। अपने लोगों की बेहतरी की तुम्हें चिंता लगी रहती है। जानकर अच्छा लगा। लेकिन मैंने भी कोई घास नहीं छिली, समाजशास्त्र में एमए हूं। तुमसे बस इतना ही कहना चाहूंगा, जो हो गया सो हो गया। तुम ‘नेतागिरी’ में मत पड़ो।”

“ऐसी बात नहीं है भाई, सभी नेता या पार्टी की विचारधारा बुरी ही होती है। वोट देना हमारा मौलिक अधिकार है। संविधान से आम जनता की मिली यही तो सबसे बड़ी ताकत है। जिससे पांच वर्षों में हम निरकुंश सत्ता को उखाड़ फेंकते हैं।”, विनायक ने यह बात इत्मीनान से कहते हुए ख़त्म की। और गहरी सांस ली।

फिर कहा, ‘नेता जी’ की पार्टी पूर्व के कार्यकाल में राज्य की सत्ता में थी। उसने हमारे लिए अच्छा या बुरा जो भी किया। कम से कम हमें जड़ों से काटने की साजिश तो नहीं रची थी। यदि हमारे प्रयास से वे सत्ता में आ जाए तो इसमें अपने ही लोगों की भलाई है।”

“लेकिन ये लुभावने भाषण, विकास के वादे, संविधान, लोकतंत्र, सत्ता, विकास, राष्ट्रीयता आदि-आदि की कोरी आदर्शवादी बातें, महज़ सुनने में ही अच्छे लगती हैं। सत्ता मिलते ही सभी नेता एक थैली के चट्टे-बट्टे निकलते हैं। देश की आजादी के कई दशक बीत गए। हम मूल निवासियों का शोषण रुका क्या अभी तक?”, बोलते-बोलते हरिमोहन की आंखें तमतमा गई।

“मैं आपके कहे को गलत नहीं ठहरा रहा हरि भाई, ना मैं आपके उपर अपनी कोई विचारधारा लाद रहा। आप लोग जिन काल मार्क्स, लेनिन, स्टैलिन, चे ग्वार, माओत्से तुंगे के विचारों से प्रभावित हैं। माओ की नीतियों पर चलते भी हैं। उनको हमने भी पढ़ा है, जाना है। लेकिन मैं आपसे कहना चाहूंगा कि यह देश बुद्ध, अम्बेडकर और गांधी का है। जहां हिंसा के लिए कोई ज़गह नहीं। हम दोनों का उधेश्य एक है, सामाजिक न्याय, लेकिन रास्ते अलग-अलग। ऐसे में, आपको भी हमारे काम से आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

“कमांडर दो बजे गए। अब हमें चलना चाहिए, टाइम हो गया निकलने का।” एक कामरेड ने फुसफुसाते हुए कहा।

“ठीक है। हम लोग निकल रहे हैं। लेकिन कुछ गड़बड़ हुआ तो याद रखना।” हरिमोहन यह कहते हुए खड़ा हो गया। फिर सभी वहां से चले गए। इस बीच विनायक यह नहीं समझ पाया कि यह धमकी थी या नसीहत। ऐसा कहने के पीछे की वज़ह क्या रही होगी।

रात में देर से सोने के कारण सुबह आठ बजे उसकी आंखें खुलीं। आदत के मुताबिक व्हाट्सएप्प खोलकर देखने लगा। तभी ‘लोकल न्यूज़ ग्रुप’ में एक ख़बर पढ़कर वह सन्न रह गया। ‘प्रतिबंधित जनक्रांति संगठन का कमांडर हरिमोहन उर्फ वारियर तीन साथियों के साथ पुलिस मुठभेड़ में मारा गया’। इससे आगे का मज़मून वह पढ़ता, पापा ने उसके कमरे में दस्तक दी। कुछ चिंतित से लगे।

उन्होंने कहा, “बेटे कल कमांडर और उसके तीन साथी मारे गए, मुठभेड़ में। पुलिस गांव में आई है, पूछताछ के लिए। सभी लोगों ने अपने घरों का दरवाजा बंद कर लिया है।”

विनायक बिना कोई जवाब दिए सीढ़ी पर चढ़ा। उसमें लगे झरोखों से झांका। देखा कि एक खाकी वाले अधिकारी कंधे में छोटा सा लाउडस्पीकर लटकाए, माइक से बोल रहे थे, “मैं डीएसपी राघवशरण भाटी बोल रहा हूं। घबराइए नहीं हमारा सहयोग कीजिए। हम आपकी ही सुरक्षा के लिए हैं। आपको सूचित किया जाता है कि कल देर रात ‘जनक्रांति’ के सदस्य मुठभेड़ में मारे गए। हमें सूचना मिली है कि वे इसी गांव से बैठक कर लौट रहे थे। क्या कोई सज्जन बता सकता है, वे यहां क्या करने आए थे?”

यह सब सुनकर वह पापा की हिदायत को ध्यान दिए बगैर तेजी से नीचे उतरा। और घर से बाहर निकल आया। कहा, “जी सर नमस्कार, पूछिए क्या जानकारी चाहिए?”

“आपकी तारीफ?”, डीएसपी भाटी ने उसके बोलने का सलीका देख घूरते हुए पूछा।

“जी, मैं विनु उर्फ विनायक। टीयू से पीजी कर रहा हूं। अभी छूट्टी में घर पर हूं। वैसे मैं यहां के वार्ड सदस्य का पुत्र भी हूं।”

“ओहो, तभी तो कह रहे हैं कि… आजकल तो आपकी यूनिवर्सिटी काफी चर्चे में है। मीडिया में हर तरफ़ छाए हुए हैं वहां के छात्र। पढ़ाई कम राजनीति ज्यादा। अजीब-अजीब सी मांगें कर रहे हैं, देश बर्बाद करने की पूरी…”

डीएसपी के लहज़े में छुपे हुए व्यंग को भांप गया वह। बीच में ही उनकी बात काटते हुए बोला, “निवेदन है सर, काम की बात की जाए। बोलने के लिए मेरे पास भी बहुत कुछ है। लेकिन डिबेट कीजिएगा तो हार जाइएगा। वैसे भी मन खिन्न है अभी।”

“ओके, ओके, रिलैक्स। जान सकता हूं कि कल वे ‘शांति दूत’ क्या करने आए थे इधर?”

“मैं लोगों को वोट देने के लिए जागरूक कर रहा हूं। यही बात उन्हें अच्छी नहीं लगी। आप तो उनकी विचारधारा जानते ही हैं। उनके दबाव के बावजूद मैंने उनकी ‘वोट बहिष्कार’ नीति का समर्थन नहीं किया, ” विनायक ने कहा।

“वैसे मैं जान सकता हूं। आप यहां के लोगों को जागरूक कर रहे हैं या किसी ख़ास पार्टी का प्रचार?” डीएसपी भाटी ने पूछा।

“खास पार्टी मतलब?” आपके इस ग़ैरवाजिब सवाल का जवाब देने के लिए मैं मजबूर नहीं हूं। बस इतना जान लीजिए हमारा देश लोकतंत्रिक मूल्यों पर टिका है। इस नाते यहां के सभी नागरिकों को चुनाव लड़ने, वोट मांगने या किसी पार्टी के पक्ष में प्रचार करने का संवैधानिक अधिकार हैं। मैं भी वहीं कर रहा।”

विनायक का यह कथन सुन उन्हें कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा था। कुछ देर के लिए चारों तरफ़ सन्नाटा छा गया। हालांकि घरों में दुबके लोग दम साधकर उनकी बातचीत सुनने का प्रयास कर रहे थे।

“कोई बात नहीं। मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था। आप बुरा मान गए। खैर, आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। कानून में भी पूरी आस्था है। इस नाते आपसे मेरी नेक सलाह है। रात वाली बात को लेकर आप स्थानीय थाने में आवेदन देकर रिपोर्ट दर्ज करा दीजिए।”

“अरे साहब। अब छोड़िए भी ना। क्या रिपोर्ट दर्ज कराकर, पढ़ने-लिखने वाले लड़के को केस-मुकदमा में लपेटिएगा। इसको अभी दुनियादारी का अनुभव ही कहां हैं।”, यह विनायक के पिता का स्वर था।

“पापा आप इस तरह से गिड़गिड़ाकर इन लोगों के सामने लाचारी क्यों दिखा रहे हैं। मुझे कोई रिपोर्ट नहीं दर्ज करानी। ना ही ऐसा करने के लिए कोई दबाव बना सकता है।”, विनय ने दाहिना हाथ उठाकर पापा को चुप रहने का इशारा किया।

“अच्छा तो हमें चलना चाहिए। यदि आपको असामाजिक गतिविधि की कोई सूचना मिले तो हमसे जरूर शेयर कीजिएगा। ये रहा मेरा मोबाइल नम्बर।”, उससे मित्रवत व्यवहार जताते हुए डीएसपी ने गंभीर माहौल को थोड़ा सहज बनाने की कोशिश की। इसके बाद वहां से अपनी पुलिस टीम के साथ निकल लिए।

भाग -3

निश्चित तिथि को चुनाव हुआ। मतगणना का परिणाम भी आया। मधुआ विधानसभा से किसान मजदूर एकता पार्टी के दिनेश्वर महतो अच्छे मतों से चुनाव जीत गए। प्रदेश में उन्हीं की पार्टी की गठबंधन वाली सरकार बनी। इस चुनाव की चर्चा पूरे देश में होने लगी। वजह रही देश की सत्ता संभाल रही पार्टी का तेजी से राज्य चुनावों में जनाधार खोना।

इधर, विनायक छुट्टी बिताकर यूनिवर्सिटी लौट गया। दो दिन हो गए थे उसे यहां आए। लेकिन कैम्पस की स्थिति काफ़ी तनावपूर्ण थी। एक तो सरकार ने इस बार फ़ीस में अप्रत्याशित बढ़ोतरी कर दी थी। उसको लेकर आंदोलन जारी ही था। उस पर दोनों छात्र संगठनों, भारतीय छात्र परिषद और इंक़लाब छात्र एकता में भी तनातनी चल रही थी। इसमें कुलपति (वीसी) की पक्षपाती भूमिका आग में घी का काम कर रही थी। आग भड़के भी क्यों नहीं, जब एक पक्ष को सत्ता का अप्रत्यक्ष सह मिल रहा हो।

उसने घड़ी की ओर देखा, नौ बजने वाले थे। आज उसका डिनर का मूड नहीं था। सोचा, ब्रेड पकौड़ा खाकर हॉस्टल में जाकर पढ़ाई किया जाए। सहसा बगल में स्थित ‘विष्णु’ ढाबे की तरफ़ उसके कदम मुड़ गए।

“दो ब्रेड पकौड़े लगाना जरा। और हां, टोमैटो नहीं चिली सॉस देना।”, उसने काउंटर बॉय से ऑर्डर लगते हुए कहा।

“सर, पैक कर दें या यहीं पर खाना है।”,

“यहीं पर लगा दो यार।”

कुछ ही देर में प्लेट में आइटम हाज़िर था। दस मिनट में उसने निपट लिया। पैसे देने के लिए पॉकेट में हाथ लगाया। तभी याद आया, अरे पर्स तो कमरे में ही छूट गया। उसने पॉकेट से मोबाइल निकाला। वहां रखे पेटीएम बार कोड को स्कैन करने के लिए हाथ आगे बढ़ाया।

“सर, पेटीएम सुविधा अभी बंद है। पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं। 20 रुपए की तो बात है कल दे दीजिएगा। वैसे भी आप हमारे पुराने ग्राहक हैं।” काउंटर बॉय का जवाब था।

उसका जवाब सुनकर विनायक मन ही मन मुस्कुराया। यहीं तो खासियत है इस कैम्पस की। कोई कितना भी कमर्शियल क्यों न हो। कुछ दिन यहां रह ले तो मिलनसार हो ही जाता है। घुलमिल कर जीना सीख लेता है। मेट्रो सिटी में इस तरह का सहज वतावरण शायद ही कहीं देखने को मिले।

लेकिन अगले ही पल यह सोचकर थोड़ा बोझिल होने लगा, “जाने इस यूनिवर्सिटी की साफ़-सुथरी आबो-हवा को किसकी नज़र लग गई।”

तेज कदमों से वहां से निकला। होस्टल से कुछ दूर पहले छह नम्बर गेट के पास जुटी भीड़ दिखी। पास गया तो देखा, मॉस्ट लाइट की दूधिया रौशनी में पार्क की हरी घास पर चौपाल लगी थी। दर्जनों की भीड़ में अधिकांश जाने-पहचाने चेहरे दिखे। अमरजीत, नरेन्द्रनाथ, संदीप, सोफिया, पुलकित मिश्रा, मालती, रेहान, जॉन पीटर, वेंकटेश… आर्ट, साइंस, लैंग्वेज लगभग सभी फैकल्टी से विद्यार्थी आए थे।

छात्र संघ का अध्यक्ष माधव मुरारी खड़े होकर अपनी चिर-परिचित शैली में जारी था। “साथियो, अभी हम बहुत ही नाज़ुक परिस्थिति से गुजर रहे हैं। अगले पल क्या हो जाए कहना मुश्किल है। एक साथ हम कई मोर्चे पर लड़ रहे हैं। ओपोजिट संगठन, सत्ता, यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन, मीडिया और आम जनता से भी। ऐसा हैवोक क्रिएट किया गया है कि पूरी ‘टीयू’ की शाख दांव पर लगी है।”

तभी उसका ध्यान विनायक पर गया। बोला, “अरे विनु, यार घर से कब आए। तुम्हारे यहां तो चुनाव में गज़ब परिणाम आया।”

जवाब में विनायक कुछ बोला नहीं। बस हाथ उठाकर मुस्कुरा भर दिया। शायद कुछ भी बोलकर इस जरूरी डिबेट को भटकाना नहीं चाहता था।

इधर, माधव वापस मुद्दे पर आते हुए पूछा, “क्या आपमें से कोई बता सकता है। तेजनारायण यूनिवर्सिटी का रहना क्यों जरूरी है?”

यह सुनकर संदीप बोला, “मैं कुछ कहना चाहता हूं।” इतना कहते हुए अपनी ज़गह पर खड़ा हो गया। लोक प्रशासन विषय से एमफिल का छात्र था। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या पर अच्छी पकड़ थी। बोलता भी बेजोड़ था।

बोला, “मैं बावनगढ़ जैसे सुदूरवर्ती राज्य से हूं। प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद आज तक वहां से गरीबी नहीं गई। जबकि बड़ी-बड़ी कंपनी वाले हमारा कोयला बेंचकर मालामाल हो गए। हमारे लोगों की दिहाड़ी पर खटते हुए कई पुश्तें बीत गई। इसका सबसे बड़ा कारण है, अशिक्षा। लोगों को अपना अधिकार पता ही नहीं।”

‘अरे भाई, बहुत लंबा खींचते हो। पकाने में तुम्हारा कोई जोडा नहीं। बिना भूमिका के तुम बोल ही नहीं सकते। मुद्दे पर आओ।”, रेहान ने बीच में ही उसकी बात काटते हुए चुस्की ली।

“हां तो इतने उतावले क्यों हो रहे हो? वहीं तो आ रहा हूं। आप सब मेरी आदत से वाकिफ़ हैं ही। आमतौर पर सामूहिक चर्चा में ज़्यादा सुनता ही हूं, बोलता नहीं। लेकिन जब बोलने की बारी आती है, तो बिना भरपेट बोले रुकता भी नहीं।” उसने कहा।

फिर चर्चा पर लौट आया, “देश के किसी भी कस्बा या गांव में अलग-अलग जाति व धर्म में जब बच्चे जन्म लेते हैं। कोई किसान, कोई मजदूर, कोई रिक्शाचालक, कोई मोची, कोई दर्जी की संतान के रूप में आंखें खोलता है। वह बच्चा बचपन से ही घर में कई तरह की बातें सुनते बड़ा होता है। ये फलाने बाबू जमींदार, ये चिलाने साहब उद्योगपति, डॉक्टर, व्यवसायी हैं।”

“सॉरी!” ये कहकर उसने बहुत देर से वाइब्रेट कर रहे मोबाइल को पैंट के पॉकेट से निकाला। कॉल में आ रहे नम्बर को देखा। फिर उसे बंद कर वापस पॉकेट में रख लिया।

“हां तो मैं कह रहा था” के तकिया कलाम के साथ वह शुरू हो गया, “सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए उन बच्चों में समाज आत्महीनता भर देता है। उनके दिमाग में यह बैठा दिया जाता है। पूर्वजन्म के अच्छे कर्मों के हिसाब से आदमी कर्म फल भोगता है। एक काम्प्लेक्स सबके ज़ेहन में घर कर जाता है। भाग्य के भरोसे जिंदगी व्यतीत करने के लिए। जहां कुछ करने नहीं, कुछ होने में यकीन होता है। और फिर शोषण सहने का अंतहीन सिलसिला चलते रहता है।”

संदीप ने थोड़ी जम्हाई ली। फिर कहा, “हम वैसे परिवेश से आते हैं, जहां संघर्ष से तकदीर बदलना नहीं। सब्र से रहते हुए इंतजार करना सिखाया जाता है। वह ‘टीयू’ ही है जो हमारे अंदर आत्मविश्वास भरता है। हमें सिखाता है। कोई किंतना भी बड़ा क्यों न हो। संविधान से उपर नहीं। इंसान की सबसे बड़ी शक्ति होती है, जानकारी। जो किताबों से मिलती है, प्रोफ़ेसर के लेक्चर और आपसी चर्चा से बढ़ती है। कहा भी गया है कि विचारों से पूरी दुनिया के दिलों पर राज किया जा सकता है।”

“एकदम मेरे दिल की बात कह गए आप। मैं जिस राज्य लालगढ़ से आता हूं। वहां पर पांच कट्ठा जमीन जोतने वाला ठाकुर भी खुद को उंची जाति के होने के मुग़ालते में जीता है। जबकि उनकी हैसियत किसान मजदूर से ज्यादा की नहीं।” यह पुलकित मिश्रा का स्वर था।

पुलकित। दर्शनशास्त्र से एमए प्रथम वर्ष का छात्र, दोस्तों के बीच ‘पंडित’ के नाम से चर्चित था। कुछ दिन पहले तक वह भी बीसीपी का सदस्य था। लेकिन संगठनों की आपसी लड़ाई में जब यूनिवर्सटी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी नज़र आई। उसने वहां से किनारा करना ही उचित समझा। स्वतंत्रता सेनानी का पोता और परिवार की समाजवादी पृष्ठभूमि का होना भी एक बड़ा कारण था।

उसका मानना था, “सामाजिक न्याय की चाहत रखने वाले को हमेशा दमनात्मक नीतियों का विरोधी होना चाहिए। ना कि सत्ता का तलवा चाटने वाला।”

अब सोफिया के बोलने की बारी थी। उसने पंडित की बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, “लोगों को अपनी ट्रेडिशनल मानसिकता बदलनी होगी। देश में शोषण का रूप बदल गया है। वह चाहे किसान, मजदूर, दलित, महिला, पिछड़ा, किसी भी वर्ग का निम्नमध्यवर्गीय परिवार हो या बेरोजगार। सबकी लड़ाई अभी पूंजीवादी व्यवस्था से है। यह हमारा ही नहीं पूरे विश्व का मामला बन गया है। जेंडर, कास्ट डिस्क्रिमिनेशन, इकोनॉमिक एनइक्वलिटी किसी भी समाज की तरक्की के सबसे बड़े रोड़े हैं।”

“बिल्कुल, जिस तरह से सरकारी जॉब, शिक्षण संस्थानों में कटौती कर निजीकरण को बढ़ावा मिल रहा है। देश के 70 प्रतिशत युवा टैक्स भरने वाले मजदूर बनकर रह जाएंगे। महंगे लोन लेकर बच्चे को पढ़ाओ। वहीं बच्चा जब किसी निजी कम्पनी में नौकरी करेगा। टैक्स काटकर मिल रही सैलरी से पहले एडुकेशन लोन भरेगा। फिर दाल-रोटी चलाने, बच्चों को पढ़ाने, गाड़ी, मकान की ईएमआई भरने में ज़िंदगी पिसती रहेगी।” अध्य्क्ष माधव ने हामी भरी।

कहा कि, “हमारा विरोध निजी कंपनी या एडुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स से नहीं है। खुले और ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में खुले। लेकिन सरकारी संस्थानों की बंदी की शर्त पर मंजूर नहीं होगा। कंपनी बिठाने के नाम पर अनावश्यक रूप से जंगल, पहाड़ जैसे नेचुरल रिसोर्सेज नष्ट नहीं किए जाए।”

तभी एक साथ कई कदमों की आहट सुनाई दी। दर्जनों की संख्या में नकाबपोश हाथों में हॉकी स्टिक, लोहे का रॉड, डंडे लिए आते दिखे। एक साथ कई आवाजें आई, “मारो साले देशद्रोहियों को।” फिर तो फटाक, फटाक… जबर्दस्त भगदड़ मची वहां पर। किसी की बांहों में, पीठ में तो किसी के पैर में चोटें आई। विनायक ने खुद को संभालते हुए देखा कि मुख्य गेट की ओर पुलिस खड़ी है। लेकिन सहायता के लिए नहीं आ रही। इससे पहले कि वहां से भागता। एक हॉकी स्टिक उसके माथे पर पड़ी। वहीं गश खाकर गिर पड़ा।

होश भी आया तो अगली सुबह अस्पताल में। वहां आईसीयू में बेड पर पड़ा था। उसने हाथों से छूकर कन्फर्म होना चाहा, सिर पर पट्टी बंधी थी। तभी नर्स ने उसे देखा।

पास आकर बोली, ‘कैसी तबीयत है अभी?”

“सिर भारी लग रहा है।”

“बाबू, अभी थोड़ा-थोड़ा दर्द करेगा। तुमको बहुत चोट लगी थी। ढेर सारा खून निकला है। छह टांके पड़े हैं। टेंशन नहीं करने का। मेडिसिन लो, कुछ दिन आराम करो। गॉड सब ठीक कर देगा।”

विनायक ने गौर किया, टूटी फूटी हिंदी-अंग्रेजी में बतिया रही अधेड़ उम्र की गोरी क्रिस्चियन नर्स थीं। तब तक वह पहिया वाले बेड को पुश करने लगी।

पूछा, कहां ले जा रही हैं अभी?”

“तुम्हारी स्थिति कंट्रोल में है। अस्पताल के जेनरल वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा है।”

उसने देखा जेनरल वार्ड में पहले से ही कई मरीज पड़े थे। चारों ओर कराहने, खांसने की आवाज़। स्लाइन की बोतलें टंगी हुई। अजीब सा फील हो रहा था उसे। तभी टीवी पर चल रहे न्यूज की ओर ध्यान गया। स्क्रोल में ख़बर चल रही थी, “टीयू कैम्पस में आईसीए संगठन व बाहरी उपद्रवियों के बीच जमकर मारपीट, कई घायल, बीसीपी संगठन के छात्रों को भी आई गम्भीर चोटें”

वहीं एंकर बोल रही थीं, “तेजनारायण यूनिवर्सिटी में बाहरी उपद्रवियों ने किस साजिश के तहत इंक़लाब छात्र एकता के सदस्यों से मारपीट की, बदले में उन्होंने भारतीय छात्र परिषद से जुड़े छात्रों को भी चोटें पहुंचाई। ऐसा क्यों हुआ, जांच का विषय है। आपको बता दें कि आए दिन हो रहे विवादों के चलते छात्रों की पढ़ाई अधर में लटकी है। देश भर के बुद्धिजीवियों की राय आ रही है कि वामपंथियों की अमर्यादित हरकतों के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। कुछ समय के लिए यूनिवर्सिटी को बंद ही कर देना चाहिए।”

अचानक उसे याद आया। उसने जीन्स के पॉकेट को हाथों से टटोला, “अरे, मेरा मोबाइल कहां गया, सिस्टर क्या आप जानती है?”

“हां, अभी लाकर देती हूं। ड्रावर में रखा है।” नर्स ने लेकर मोबाइल दिया तो उसने स्विच ऑन किया। देखा, चार्जिंग लेबल 30 प्रतिशत बचा हुआ था। जैसे ही कॉल करने के लिए की पैड टच किया। उधर से आ रही कॉल के चलते रिंग टोन बजने लगा। घर का नम्बर था।

“हेल्लो, हां प्रणाम पापा।”

“खुश रहो। सुबह से लगातार फोन मिला रहा था। बंद बता रहा है। काफ़ी फ़िक्र हो थी तुम्हारी। सब ठीक है न? टीवी पर देखा, तुम्हारे कॉलेज की खबर। बता रहा है, फिर से मारपीट हुई है। बहुत छात्र घायल हैं।

“नहीं, नहीं आप जरा भी चिंता मत करिए। मैं बिल्कुल ठीक हूं।”

“तुम्हारी आवाज इतनी धीरे-धीरे क्यों निकल रही है। मुझसे कुछ छुपा रहे हो क्या विनु?

यह सुनकर वह अपने जज़्बात पर काबू नहीं रख पाया। फफककर रोने लगा। उसको सुनकर पापा भी शुरू हो गए। इधर बाप उधर बेटा, रोते हुए दोनों हो एक दूसरे को सांत्वना देने लगे। अस्पताल के अन्य मरीजों के साथ नर्सों का भी ध्यान उसकी तरफ़ हो गया।

“पापा, प्लीज चुप हो जाइए। मुझे कुछ नहीं हुआ। हल्की-फुल्की चोट आई थी। अब ठीक हूं। आप तो सीरियसली ले लिए इसे।”

“बेटा है मेरा तू, तुझे जन्म दिया, पाला, पोसा और बड़ा किया। तुमसे ज़्यादा तुमको समझता हूं। कोई एक थप्पड़ भी मारता है तुम्हें। तो लगता है मेरे कलेजे पर सौ लाठियां चली हैं।”, उधर खेदन महतो ने आंसुओ को पोछते हुए खुद को सामान्य बनाने की कोशिश की।”

सुबकते हुए बोले, “जिस कंधे पर तुझे घूमा-घूमाकर बड़ा किया। आज उसे तेरे सहारे की जरूरत है। एक तो पहले से ही दुख झेल रहा हूं, ‘बड़का (बड़ा बेटा)’ असम कमाने गया। और शादी कर वहीं पर घर बसा लिया। पांच वर्ष हो गए। आज तक उसे याद नहीं आई कि गांव में उसका कोई अपना भी है। अब नहीं चाहता कि मेरे बुढ़ापे की इकलौती लाठी भी टूट जाए।”

“आप ऐसे हिम्मत हारकर, मुझे कमजोर नहीं कीजिए। अभी मुझे पढ़ना है। अपने ही लिए नहीं, समाज के लिए भी। प्लीज आप चुप हो जाइए।”

“भाड़ में जाए तुम्हारी पढ़ाई और समाजसेवा। सब कोई कमाने-खाने, एक-दूसरे को लूटने में लगा है। नेतागिरी का चक्कर छोड़ो बेटा। एक काम करो, कल ट्रेन पकड़ो और वहां से चले आओ। यहां तुम्हारी रिश्तेदारी के लिए भी कई लोग आ रहे हैं। पता है, विधायक जी ने चिमनी का लाइसेंस दिलवाने की बात कही है। बैंक से लोन भी करवा देंगे। आकर संभालो ये सब।”

“पापा, आप क्षणिक भावना में बहकर इस तरह की बातें कर रहे हैं। आप इतना मतलबी कैसे हो सकते हैं, संभालिए खुद को। ज़िंदगी कोई तीन घण्टे की फ़िल्म नहीं। अपना पेट तो कुत्ता भी पाल लेता है। इतना जान लीजिए, मैं यहां आया भले ही उंची पढ़ाई और अच्छी नौकरी के लिए था। लेकिन मेरे जीने का मक़सद अब बदल गया है।”

“देख, मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। तुझे आना ही होगा। कह दिया तो कह दिया। नहीं तो आज से मेरा खाना बंद।”

“पापा, मैं आपकी जिद जानता हूं, जो कहते हैं पूरा करते हैं। लेकिन मैं भी कम जिद्दी नहीं, खून तो आपका ही हूं। याद है, जब मैं गांव के स्कूल में पढ़ता था। मास्साब बस्ती के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आते, तो एक कविता अक्सर सुनाया करते थे। आपको भी वह बेहद पसंद थी। उसकी दो पंक्तिया आज भी मुझे प्रेरित करती हैं। ‘हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर  में संघर्ष हमारा नारा है, हम रुके नहीं हम झुके नहीं कहता इतिहास हमारा है… बाकि, आप खुद समझ लीजिए।”

इतना कहते हुए विनायक ने फोन काट दिया। इससे आगे वह कुछ कहने या सुनने की स्थिति में भी नहीं था। और दोबारा फूट-फूटकर रोने लगा। लेकिन, शायद इस बार उसकी आंखों से निकल रही आंसू की बूंदें। उसको कमजोर करने के लिए नहीं, उसके बोझिल मन की पीड़ा को हल्का करने के लिए थीं। (पूरी कहानी मेघवाणी ब्लॉग पर भी उपलब्ध है।)

©️®️श्रीकांत सौरभ (साहित्य के अथाह समंदर का नवोदित तैराक हूं। किसी भी एक भाषा का मुक़म्मल ज्ञान नहीं, देवनागरी से बेपनाह मोहब्बत है। मेरा लिखा पढ़कर प्यार लुटाइए या नाराज़गी जताइए। लेकिन अपनी भावनाओं को छुपाइएगा मत।)

नोट – मनोरंजन के लिए लिखी गई यह कहानी, पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें जिक्र किए गए जगहों और पात्रों के नाम की, किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता संयोग मात्र कही जाएगी।

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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