लघु कहानी – मन की बात

पत्नी – “ए जी, सुनते हैं पमी के पापा! भेलेन्टाइन डे नियरा गया है। उस दिन फिलिम दिखाने ले चलिएगा न ‘सिनेपोलिस’ में?”

ऑफिस के लिए तैयार होते पति – “तुम भी न एकदमे सठिया गई हो। छव बरिस हो गया बियाह हुए। बाल-बच्चेदार हो गई। मने..!”

पत्नी – “त का बूढ़ा गए हैं हमलोग?”

पति – “अब अपने बारे में कह सकता हूं। तुमको कुछ कहने का अवकात हमको कहां? नहीं तो भेलेन्टाइन में देरी है। अभिए ‘बेलन टाइट’ करने लगोगी।”

पत्नी – “जादे बहाना मत बनाइए। मैरेज से पहिले फोनवा पर कहते थे। करेजा, जानू, जानेमन तुम्हारे लिए ई करेंगे, ऊ करेंगे। मने आज ले मन तरसते रह गया। कहियो त होटल, रेस्टोरेंट ले चलेंगे। हाथ में हाथ मिलाकर बतियाएंगे, सीरियल में जइसन होता है।”

पति – “वहीं तो हम भी कह रहे हैं कि बियाह से पहले तुम्हारे देह से रेकसोना बॉडी स्प्रे महकता था। अब आटा, तेल, मसाले की गंध आती है। सब दिन एकही समान थोड़े रहता है।”

पत्नी – “त का करे? घर के साफ-सफ़ाई, खाना बनाना छोड़ दे। आ दिन भर सेंट लगाके सुतल रहे, बोलिए? मने इसके लिए तो नोकर रखना होगा न?”

पति – “वो तो हम हैं कि बक्सर के हेठार (दियरा) से सीधे तुमको राजधानी पटना लाए। ना त केतना अगुआ आगे-पीछे कर रहे थे।”

पत्नी – “हम कवनो फ्री में आए हैं का? पूरे 10 लाख कैश गिने थे बाबूजी। हमसे बढ़िया त सखी है। पांचे लाख में सेट हो गई थी। गुड़गांव में हसबैंड के साथ रहती है। शादी उसके लिए केतना लकी रहा! 25 हजारे कमाने वाला पति बाद में एमबीए कर लिया। आज लाख रुपए महीने में कमा रहा। अपना फ्लैट, अपनी गाड़ी है। व्हाट्सएप्प पर पिक भेजते रहती है। मॉल में खरीदारी करने, रेस्टोरेंट में पिज्जा, बर्गर खाने, मल्टीप्लेक्स में फिलिम देखने का।

पति – “ई बात तो अब अगुआ न बताएंगे कि काहे हमरा से बियाह कराए? ऊ सब पापा जी से कहे थे। लड़की गांव में रहती है। मने बक्सर कॉलेज से बीए में पढ़ रही है। का गांव, का देहात, कवनो माहौल में रखिएगा। वहीं सेट कर जाएगी। ये भी बताए थे कि लड़की तनी सांवर है। पटना जइसन शहर में बिजली बत्ती के अंजोरा रहेगी त गोरा जाएगी।”

पत्नी – “उहे अगुवा तो हमारे बाबू जी से कहे थे कि लड़का पटना सचिवालय में सेटल है। अभी नोकरी टेम्परोरी है मने आगे चलकर परमानेंट हो जाएगा। आपकी बेटी राज करेगी। हूं..! इहे ‘राज’ लिखा था हमारे किसमत में!”

पति – “तुमको और कोई टाइम नहीं मिलता है, बहस के लिए। जब निकलना होता है, तभी शुरू हो जाती हो। घड़ी में देखो, साढ़े आठ हो गया है। नौ बजे के बाद पहुंचा तो हाजिरी कटा समझों।”

पत्नी – “अब त कहबे करेंगे। जवाब नहीं सूझता है तो कोई न कोई बहाना कके निकल जाते है। रात को नींद ही लगती है। दिन में फुरसत नहीं है। संडे को इयार दोस्त से मिलने निकल जाते हैं। तो हमसे बतियाने का मोका कब है?”

पति – “देखो, तुम सब बुझते हुए भी बच्चों वाली बात करती हो। सचिवालय में नोकरी है लेकिन ठेका वाली। पहले 15 मिलता था। अब 25 हजार हो गया है। वो तो कुछ उपरवार हो जाता है। नहीं तो घर से खरचा मंगाना पड़ता। मेरे जैसे हजारों लोग इसी तरह से सरकारी के नाम पर खट रहे हैं। सबको आशा है कि एक न एक दिन वेतनमान मिल जाएगा। अब पमी भी चार साल की ही गई। अप्रैल में नाम लिखवाना है। फिजूलखर्ची से काम कैसे चलेगा, तुम्हीं बताओ?”

पत्नी – “बात बनाना कोई आपसे सीखे। हम कवनो नहीं समझते घर की स्थिति। मने एगो फिलिम दिखाने का बात मुंह से का कह दिए। आप लगे परवचन सुनाने। अरे कवनो हम जाइए रहे थे का? खाली हां, कर देते तो मन खुश हो जाता। पति हैं आप। दिल के बात आपसे नहीं कहेंगे तो का दोसर मरद को सुनाएंगे! अब आप ऑफिस जाइए। कहीं सांचो के लेट नहीं हो जाए!”

©️®️श्रीकांत सौरभ (नोट – यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। लेकिन एक सीख है, उन अभिभावकों के लिए। जो यह सोच कर बेटी की शादी करते हैं कि ‘सरकारी’ नौकरी वाला ‘दूल्हा’ खुश रखेगा उनकी लाडली को। शादी के मामले में ‘लड़का’ या ‘लड़की’ किसी भी पक्ष या अगुआ को वस्तु स्थिति नहीं छुपानी चाहिए। और पति-पत्नी भी यह बात अच्छी तरह से समझ लें, शादीशुदा ज़िंदगी कोई सीरियल नहीं। जिसमें हर पल मौजमस्ती, सिनेमा, फैशन, प्रपंच दिखते रहता है। यह एक जिम्मेवारी है और हर हाल में सामंजस्य बनाकर चलना होता है।)

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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