लघु प्रेम कहानी – वैलेंटाइन वीक

मोबाइल पर चंदू : “हैलो, चिंकी।”

चिंकी : “हां, हैपी रोज डे!

चंदू : “अरे वाह, सेम टू यू! विश करने के लिए पहिले हम फोन किए। आ उल्टे तुम्ही..! लेकिन तुम कैसे जानती हो?”

चिंकी : तो का हम नहीं जानते हैं? आजु कवन फेस्टिबल है!”

चंदू : “फेस्टिबल?”

चिंकी : “और क्या? भले आप इंटर करे मोतिहारी चले गए। आ हम गांव में रहते हैं। एकर मतलब ई नहीं हुआ कि हमको कुछो नहीं पता।”

अंजान बनते हुए चंदू ने पूछा : आछा। तो क्या जानती हो?”

चिंकी : “परसों सैंकी दीदी मिली थी मटकोरा में। वो बताई थी हमको।”

चंदू : “अब ये ‘सैंकी दीदी’ कौन है?”

चिंकी : “अरे बताया तो था। चंदन चाचा की बेटी पूनम दीदी के बारे में। उन्हें घर में प्यार से सब ‘सैंकी’ कहते हैं। कितनी जल्दी भूल जाते हैं आप? वो मुजफ्फरपुर से बीसीए कर रही हैं। पट्टीदारी में बियाह है तो आई हैं।”

चंदू : “ओहो! याद आ गया। हम तो भूलिए गए थे। वैसे और क्या कह रह थी दीदी?”

चिंकी : “और का? बता रही थी कि आज के दिन बॉयफ्रेंड अपने लभर को गुलाब का फूल देकर परपोज करता है।”

चंदू : “गुलाब का फूल देता है कि परपोज करता है?”

चिंकी : “जाइए हम बात नहीं करेंगे। आप तो हमको एकदमे बुरबक समझ लिए हैं। पत्रकार जैसा कोसचन पर कोसचन कर रहे हैं।

चंदू : “हाय मेरी जान, मेरी करेजा! तुम तो बुरा मान गई। सॉरी, सॉरी!”

चिंकी : “नहीं, बुरा काहे मानेंगे? जेतना जानते थे, उतना बता दिए। आपके जैसा हम यहां, कवनो एंडोरायड मोबाइल थोड़े रखे हैं। जो फेसबुक आ व्हाट्सएप्प से सब बात जान जाएंगे। बोलिए।”

चंदू : “यही तो बता रहा था मैं। लेकिन जानना चाह रहा था कि मेरी डार्लिंग कितना जानती है?”

चिंकी : “आछा तो ये बात है। बाबू साहब मेरा इम्तिहान ले रहे थे। कोई बात नहीं। हमको भी इस साल मैटिक पास कर जाने दीजिए। एक बार शहर पहुंच गए। फिर पूछिएगा हमसे।”

चंदू : “इसीलिए तो तुमसे दिल का सब बात शेयर करता हूं। तुमको बता दूं कि आज से वेलेंटाइन वीक शुरू हो गया है। पूरे एक सप्ताह चलेगा। पहला दिन रोज़ डे, दूसरे दिन प्रपोज़ डे, तीसरे दिन चॉकलेट डे, चौथे दिन टेडी डे, पांचवें दिन प्रॉमिस डे, छठे दिन हग डे, सातवें दिन किस डे। और अंतिम दिन वैलेंटाइन्स डे।”

चिंकी : “बाप रे..! एतना तो हम जानते ही नहीं थे।”

चंदू : “जानेमन, एहि से तो बता दिया तुमको। अब बोलो?”

चिंकी : “खैर, छोड़िए। ये बताइए कि आपका आईएससी का एक्जाम कइसन जा रहा है?”

चंदू : “अभिए तो मैथ का पेपर देकर लौटे हैं। केमेस्ट्री का थिउरी थोड़ा गड़बड़ाया है। मने प्रैक्टिकल से मेक अप हो जाएगा। हिंदी का पेपर बाकी है। सोमवार को लास्ट है। तुम अपना सुनाओ?”

चिंकी : “आप जानते ही हैं। साइंस तो हमारा फेवरिट सब्जेक्ट है। आर्ट और अंगरेजी में तनिका कमजोर हैं। लेकिन गेस पेपर रट रहे हैं। इनमें पास तो कर ही जाएंगे।”

चंदू : “चलो ठीक है। तुम्हारा सेंटर तो अरेराज पड़ा है न?”

चिंकी : “हे भगवान इहो भूल गए है। आप भी न। रक्सौल में सेंटर पड़ा है। और 17 से परीक्षा है। बूझ गए न।”

चंदू : “चलो, टेंशन की कोई बात नहीं है। तब ले हमारा एक्जाम तो बीत ही जाएगा। आएंगे तुम्हारे सेंटर पर सोनुआ के संगे। उसके भइया की शादी में दहेजुआ पल्सर मिला है। 30 का एभरेज देता है। खरचा के डरे कोई चलाता ही नहीं। हमने तेल डलवाने के नाम पर सेटिंग कर लिया है, परीक्षा भर के लिए।”

चिंकी : “ठीक है रखिए अब। बाद में बतियाते हैं। कोई बाहर से दरवाजा ठुकठुका रहा है।”

चंदू : “ऐसे नहीं। पहले एगो ‘किस्सी’ दे दो तब काटेंगे फोन।”

चिंकी : “इसमें मांगने की क्या जरूरत है। सब आपका ही है। ले लीजिए!”

©️®️श्रीकांत सौरभ (नोट – इस कहानी के पात्र पूरी तरह से काल्पनिक हैं। इसे सिर्फ मनोरंजन, मनोरंजन और मनोरंजन के लिए लिखा गया है।)

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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