भाषा सुधार नहीं सूचना के लिए पढ़ें अखबार

भले ही अन्य निजी संस्थानों में तमाम डिग्रियां होने के बावजूद स्किल टेस्ट लेकर ही भर्ती करने का प्रावधान है. लेकिन मीडिया में दक्षता जांच कर पत्रकार रखने की परिपाटी लगभग खत्म सी हो चुकी है. जबकि 90 के दशक के अंतिम वर्ष तक अखबारी जगत में परीक्षा लेकर रखने का चलन था. वे चाहे ग्रामीण संवाद सूत्र हों या सिटी रिपोर्टर. खासकर उनसे भाषाई शुद्धता व सामान्य जानकारी की अपेक्षा तो जरुर की जाती थी. मुझे याद है वर्ष 05 में जब मैं पटना में लेखन की एबीसी सीख रहा था.

श्रीकांत प्रत्यूष ने अपने अखबार नवबिहार के लिए बिस्कोमान भवन के नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के दफ्तर हाल में संवाददाताओं की नियुक्ति के लिए टेस्ट आयोजित किया था. जिसमें मैं भी शरीक हुआ. यहीं पर मैंने जाना कि अंग्रेजी शासन में श्री कृष्ण सिंह बिहार के प्रथम प्रधानमंत्री चुने गए थे. हालांकि इस टेस्ट में मेरा चयन न हो सका. लेकिन महज खानापूर्ति के लिए सतही स्तर पर ही सही, एक क्षेत्रीय अखबार की यह बहाली प्रक्रिया मुझे अच्छी लगी. अब प्रिंट में काम करने के लिए देवनागरी की समझ, 4 सी लिपिका में टाइपिंग व ज्यादा से ज्यादा हुआ क्वार्क एक्सप्रेस में पेजिनेशन की कला प्रवेश की शर्तें हैं.

जबकि नौकरी बचाने व प्रोन्नति के लिए संपादक स्तर पर तगड़ी पहुंच व सेटिंग भी निहायत अनिवार्य है. ऐसे में अखबार के लिए विग्यापन जुटाने व उससे बचे खाली पन्नों को डेडलाइन की भीतर भरने की कठिन झंझावातों के बीच व्यकारण के लिहाज से भाषाई शुद्धता की बात करना बेइमानी सरीखा है. एक यूनिटकर्मी की माने तो काम की अधिकता व समय पकड़ने की हड़बड़ी में बमुश्किल शीर्षक सुधारने का वक्त मिल पाता है. स्थिति ये है कि किसी भी हिंदी अखबार के मुख्य पृष्ठ का गंभीरता से अवलोकन कर लीजिए दर्जनों खामियां जरा निकल आएंगी. तर्क यह भी है कि आज का पाठक भाषा सुधारने के लिए नहीं सूचना पाने के लिए अखबार पढ़ता है.

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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