मेरी वीरगंज (नेपाल) यात्रा – 1

जब भी रक्सौल आता हूं, जाने क्यों नास्टलेजिक हो जाता हूं. इस पार भारत व उस पार नेपाल का वीरगंज शहर. इस बार मां की आंखों के इलाज के लिए परवानीपुर (नेपाल) आया हूं. लकिन रक्सौल में ही एक रिश्तेदार के यहां ठहरना हुआ है. सीमा पर बसा यह अनुमंडलीय शहर दूसरों की नजर में भले ही अंतराष्ट्रीय कस्बाई बाजार से ज्यादा मायने नहीं रखता हो. लेकिन एक पत्रकार व लेखक के तौर पर मेरी भावुक आंखें यहां ‘कुछ’ और ही तलाशती हैं. तो जेहन में कई तरह के विचार कुलांचे मारने लगते हैं.

हालांकि मेरे गांव कनछेदवा से रक्सौल की दूरी महज 40 किमी है. सो साल में एक दो बार जरुर आना होता है. लेकिन पूरे 11 वर्ष बाद उस पार वीरगंज जाना हुआ. जाहिर सी बात है इतने समय के अंतराल में कई सारी चीजें बदली हैं. कंक्रीटों के जंगल के बीच व्यस्त सड़क पर ट्रक, आटो व घोड़ा गाड़ी की कतारें लंबी हुई हैं. तो भागमभाग के बीच जाम में फंसा पूरा शहर धूल व धुआं के गर्द गुबार में उनींदा अंघिआया मालूम होता है. लेकिन नहीं बदला है तो टांगे वालों का खांटी भोजपुरी बोलने का वह जमीनी अंदाज.

यहां के आम लोगों में भोजपुरिया ठसक के साथ एक खास तरह का आत्मीय लगाव बरबस ही मन मोह लेता है. साथ ही गजब के अपनापन का अहसास होता है. बचपन से सुनते आया हूं यह अरबपतियों का शहर है. धनकुबेरों की अनगिनत सूची में यहां का पान बेचने वाला भी करोड़पति है. शायद यहां संचालित कई तरह के गोरखधंधे से यह अफवाह फैली हुई है. मसलन चरस, गांजा, हेरोइन, जाली नोट, आर्म्स, कंप्यूटर पार्ट्स, सोना, खाद, अनाज की तस्करी से लेकर रुपये की खरीद बिक्री तक. पर इतना तो तय है कि यहां पोस्टिंग के लिए हर सरकारी कर्मी तरसता है.

चाहे वह पुलिस, कस्टम, राजदूत हो या प्रखंड के अधिकारी. सुनने में तो यह भी आता है कि यहां तैनाती के लिए उंची बोली लगती है. यहीं नहीं दो नंबर की कमाई करने वालों की भीड़ हर रविवार को वीरगंज के बीयर बार व होटलों में अय्याशी के लिए उमड़ पड़ती है. वही शाम ढले शराब, श्बाब व कवाब से लेकर जुए के लिए कैसिनो की महफिल सज जाती है. इतना होने के बावजूद भी दोनों तरफ के लोगों में गजब की सरलता, सहजता व मौलिता हैं. नेपाली व भारतीय रुपए का मिला जुला चलन. भोजपुरी, हिंदी व नेपाली किसी भाषा में बात कर लीजिए, इसको लेकर कोई दुराग्रह, पूर्वाग्रह या बनावटीपन नहीं. जारी…

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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