प्लीज, शहरी जिंदगी में गंवारपन को मरने मत दीजिए!

 

‘ए घरी के मेहरारू आवत बाड़ी स, मत पूछीं। सभके उहे हाल बा, ले लुगरी आ चल डुमरी’, रमेसर काका ने जैसे ही यह पंक्तियां बोली। तभी बगल में बैठे फुलेना भगत ने कहा, ‘बै मरदे, नइख$ सुनले लोगिन, ‘भतरा सुनर हम सुनरी अउरी सभे बानर बनरी।’ इसी के साथ बथान पर बैठे लोग खिलखिलाकर हंस पड़े। गांवों में जहां कहीं चार-पांच उम्रदराज लोग चौपाल में जमा हुए। ऐसे कई तरह के किस्से छूटने लगते हैं।

भोजपुरी अंचल में ऐसी कहावतों से एकल परिवार पर तंज कसा जाता रहा है। इसका मायने वैसे स्वार्थी दंपति से है, जहां पत्नी के लिए उसका पति ही सब कुछ होता है। दरअसल यह मुहावरा तब गढ़ा गया होगा। जब संयुक्त परिवार का चलन आदर्श माना जाता था। एक साथ बड़े ठाठ से तीन पीढियां गुजर-बसर करतीं। खेत, खलिहान और सामाजिक भाईचारे पर पूरी गृहस्थी टिकी थी।

थोड़ा याद कीजिए, वो दौर गुजरे ज़्यादा दिन नहीं हुए। जब क़स्बे के अधिकांश घर खपरैल के हुआ करते थे। बुजुर्गों के लिए दुआरे पर फूस का दालान होता। आठ से दस कमरों वाले वैसे घरों में बाहर की तरफ़ ओसारा और भीतर में आंगन जरूर रहते थे। ओसारे में गोरेया बाबा तो भीतर एक कमरा ‘भंसा घर’ का होता। इसमें खाना पकता और एक भाग घेरकर पूजा घर बनाया जाता। जहां बन्ही माई पूजी जाती थीं।

भंसा घर को लेकर कठोर नियम था। क्या मज़ाल कि कोई चप्पल पहनकर उसमें घुस जाए। मीट-मछली बनाने के लिए आंगन में चूल्हा रहता। इसके लिए प्रयोग में आने वाले करवाईन बर्तन अलग रखे जाते थे। इसी तरह रिश्ते की अपनी गरिमा थी, मर्यादा हुआ करती थी। परिवार में लोग कई तरह के संबोधन से नवाज़े जाते थे। बाबा, ईया, बड़का बाबू, बड़की माई, लाल चाचा, लाल चाची, कनिया, देवर जी, भसुर जी, दुल्हिन, बबुआ, भउजी, फुआ आदि आदि।

घर के मुख्य दरवाजे यानी दुआरी पर अनिवार्य रूप से पर्दा टंगा रहता। नई नवेली कनिया को यहां से आगे निकलने की इजाज़त नहीं थी। हां, ईया और बड़की माई को ख़ास काम से बाहर निकलने की छूट थी। लेकिन बड़की माई को घूंघट करना होता। घर की महिलाएं सामूहिक रूप से ढेंकी से धान कूटकर चिउरा या चावल बनातीं। जांते पर गेंहू, चने, चावल पिसे जाते। चापाकल से पानी निकालकर घरेलू काम किए जाते। कमोवेश सबकी जिम्मेवारियां बंटी होतीं।

मेहनत से बड़ा फ़ायदा ये था कि शायद ही महिलाओं को कोई बीमारी होती। सौ प्रतिशत नॉर्मल प्रसव होता। और सिजेरियन किस चिड़िया का नाम है, ये कोई नहीं जानता था। बड़ी से बड़ी मुसीबत भी लोग आसानी से झेल लेते थे। कोई विवाद होता भी तो मिल-बैठकर सुलह कर लिया जाता। परिवार में छोटे बच्चे को गोदी में घूमने का भरपूर सुख मिलता। हर कोई उन पर प्यार लुटाता। वहीं कब्र में पैर लटकाए बैठे बड़े-बुजुर्गों और बीमारों की भी जमकर सेवा की जाती।

लेकिन किसे पता था कि महज दो दशक में ही ये तमाम चीजें ग्लोबलाइजेशन की बलि चढ़ते जाएंगे। जिस एकल परिवार को ओछी नज़रों से देखा जाता है। वो क्वालिटी लाइफ बिताने वाली ‘सिंगल फैमिली’ के रूप में स्टेट्स सिंबल बन जाएगा। इसमें वर्किंग कपल, दो बच्चे, छोटा सा बंगलो या टू-थ्री बीएचके का फ्लैट, गाड़ी का कांसेप्ट शामिल है। अब तो जिसे देखों उसमें एक होड़ सी मची है, इस कांसेप्ट पर जीते हुए भौतिक संसाधन जुटाने की।

ख़ैर बदलाव दुनिया की नियति है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। संयुक्त और एकल परिवार की अपनी खूबियां या खामियां हैं। इस पर कई तरह के शोध हुए हैं, हो रहे हैं। लेकिन अकेलापन और तनाव से पनपा डिप्रेशन, आत्महत्या, तलाक, वृद्धा आश्रम जैसी ढेरों विकृतियां भी इसी जीवन शैली की देन है। महानगरों के साथ ही छोटे शहरों में भी यह विकृति पसरने लगी है।

लोगों को कोलाहल में शांति चाहिए, तो उन्हें जड़ों की तरफ़ लौटना ही होगा। यहां लौटने का मतलब पलायन से नहीं, विरासत संभालकर रखने से है। वैसी विरासत जो हमे दादा-परदादा से संस्कार के रूप में मिली है। हर हाल में हमें नई पीढ़ी को मां, मातृभूमि और मातृभाषा का महत्व बतलाना ही होगा। उन्हें सिखाना होगा कि अपने स्वभाव की मौलिकता को त्यागने का बुरा असर क्या होगा। पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण से हम अंग्रेज तो कतई नहीं कहला सकते। गुलामी की भाषा बोलने वाला रट्टू तोता जरूर बन जाते है।

कैसे भुला सकते हैं कि शहर में किसी के दरवाजे पर चले जाएं। वहां मुश्किल से पानी के लिए पूछा जाता है। थोड़ी घनिष्ठता है तो चाय, मिक्सचर और बिस्कुट मिल जाएंगे। जबकि गांवों में कोई कितना भी गरीब क्यों नहीं है। यहां कोई अतिथि आता है तो उससे खाने के लिए जरूर आग्रह किया जाता है। बुजुर्गों की सेवा नहीं करने पर सामाजिक उपहास उपहास उड़ाया जाता है। होली, चैती, लोक गीत की गवनई हो या फिर शादी, पार्टी, दीवाली, छठ जैसे आयोजन। उनमें सामूहिक भागीदारी की होड़ रहती है।

हमें समझना होगा, युग कोई भी रहे। नौनिहालों को जैसा संस्कार देंगे, बदले में वे हमसे वैसा ही व्यवहार भी करेंगे। प्रकृति का भी यहीं नियम है, जो देते हैं उसे ही बढ़ाकर हम लौटाती है। वर्षों पहले हम जिस गांव की मिट्टी में लोटाकर पले, बढ़े। और अच्छी जीवनशैली की चाहत में उसे छोड़कर शहर आए थे। जरूरत है उन ग्रामीण मूल्यों को संजो कर रखने की। भले ही हमें कोई गंवार ही क्यों न कहे।

©श्रीकांत सौरभ

 

श्रीकांत सौरभ

चंपारण (मोतिहारी) की भोजपुरिया मिट्टी में जन्म लिया। किसानी, खेत-खलिहान, बाग़-बग़ीचा, नदी-तालाब के सान्निध्य में पला, बढ़ा। दुनिया मुझे श्रीकांत सौरभ के नाम से जानती है। जब से होश संभाला लोगों को अपने जड़ों से कटते पाया। प्रकृति की पाठशाला में वर्षों से पढ़ते-लिखते बस इतना ही सीखा, हम दुनिया में कहीं भी चले जाएं, कितनी भी तरक्की कर लें। मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर कभी खुशहाल नहीं रह सकते। इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं ! मुझसे [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं।

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