“…घर के भाषा में ना बात करल खराब मानल जाला”

कल एक शादी समारोह में खाना बनाने वाले कैटरर्स को आपस में बंगाली में बतियाते देख नजरें उनपर ठहर गई. स्थानीय हलुवाई टीम का एक भोजपुरी भाषी क्षेत्र में इस कदर दूसरी भाषा में बातें करने को लेकर उनके बारे में जानने की जिज्ञासा हुई. वजह यह भी रही कि वे जितनी सहजता से बांगला बोल रहे थे, भोजपुरी भी उतनी आसानी से. पूछने पर पता चला वे बेतिया के लालसरैया गांव से हैं. उनके पूर्वज कई दशक पहले बांग्लादेश से बतौर शरणार्थी (रिफ्यूजी) बिहार आए तो यही पर बस गए. जहां उनकी अच्छी खासी आबादी हैं. मैंने पूछा, ‘तोहनी के आपन देश छूटला एतना दिन बीत गइल. बाकिर बांगला बोलल ना भुलाइल.’

तो एक ने कहा, बंगाली हमनी के माई-बाबू जी के भाषा ह, घर के भी. आ भोजपुरी चंपारण के. हमनी के अपना समाज में घर के भाषा में ना बात करल खराब मानल जाला. एही से अपना में बांगला में बतिआनी सन. उसका भोजपुरी में जवाब सुन मुझे बेहद सुकून मिला. महान हैं ये लोग जिनका वतन छूटे इतने वर्ष बीत गए. फिर भी इन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी भाषा व संस्कृति सहेज कर रखी है. और एक हम हैं जो जरा सी शहरी हवा लगी नहीं की आपस में ही हिंदी और अंग्रेजी की टंगड़ी मारना शुरू कर देते है. साथ ही मुझे तरस आया उन कथित बुद्धिजीवियों व संगठन वालों पर जो मोतिहारी व बेतिया (चंपारण) को मैथिली भाषी क्षेत्र बता इसे अलग मिथिला राज्य में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. हां, भोजपुरी भाषा के आधार पर पूर्वांचल राज्य में इन जिलों को शामिल करने की मांग बहस का उम्दा विषय जरूर है. (अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष)

सौजन्य से, तराई भोजपुरी मंच

Admin

भोजपुरिया माटी में जन्म लिया. जब से होश संभाला लोगों को जड़ों से कटते पाया. वर्षों से पढ़ते-लिखते हुए यहीं सीखा, इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए. कितनी भी तरक्की कर ले. मां, मातृभाषा और मातृभूमि को त्याग कर खुशहाल नहीं रह सकता. इसीलिए अपनी भाषा में, अपने लोगों के लिए, अपनी बात लिखता हूं !

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